भारत के 15 गांव, जिनके दो या उससे अधिक नाम हैं
कहीं पुराना नाम बचा, कहीं दूसरी बस्ती की पहचान जुड़ी तो कहीं सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है ‘उर्फ’ नाम

भारत के गांव सिर्फ खेत, घर और गलियों की पहचान नहीं हैं। कई गांवों की अपनी ऐसी कहानी है, जिसमें एक ही जगह के दो-दो नाम सुनने को मिलते हैं। किसी गांव का पुराना नाम आज भी लोग बोलते हैं तो किसी का दूसरा नाम सरकारी कागजों में दर्ज है। कहीं स्थानीय पहचान इतनी मजबूत हुई कि वह मूल नाम के साथ जुड़ गई।
चंदौली का खुचमा गांव इसका बेहद दिलचस्प उदाहरण है। यहां राजस्व रिकॉर्ड में नाम खुचमा है, शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड में कचमन और रेलवे स्टेशन पर कुछमन नाम दर्ज है। अलग-अलग नाम होने से ग्रामीणों को प्रमाणपत्र, बैंक और दूसरे दस्तावेजों के काम में परेशानी होने की बात सामने आई है। तहसील स्तर से राजस्व रिकॉर्ड में खुचमा को सही नाम बताया गया है।
लेकिन भारत में ऐसे गांवों की कहानी इससे कहीं बड़ी है। वर्ष 2011 की जनगणना के सरकारी रिकॉर्ड में उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों के गांवों के नाम के साथ Alias या Urf यानी दूसरा नाम दर्ज मिलता है।
1. खुचमा, कचमन और कुछमन—चंदौली का तीन नाम वाला गांव
चंदौली का खुचमा इस सूची में सबसे अनोखा उदाहरण है। सकलडीहा क्षेत्र के इस गांव का नाम राजस्व अभिलेखों में खुचमा है। वहीं शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड में कचमन और रेलवे स्टेशन पर कुछमन नाम मिलता है।
ग्रामीणों के अनुसार एक ही गांव के अलग-अलग नाम होने से बाहर से आने वाले लोग भी भ्रमित होते हैं। दस्तावेजों में नाम का मिलान करते समय अतिरिक्त जानकारी देनी पड़ती है। यही वजह है कि ग्रामीण सभी विभागों में एक ही नाम दर्ज कराने की मांग कर रहे हैं।
2. बिशेषरपुर उर्फ शेरपुर—मिर्जापुर
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में बिशेषरपुर उर्फ शेरपुर नाम वाला गांव जनगणना रिकॉर्ड में दर्ज है। यहां मूल नाम के साथ शेरपुर नाम भी आधिकारिक सूची में दिखाई देता है।
ऐसे नाम बताते हैं कि किसी गांव की पहचान केवल एक प्रशासनिक नाम तक सीमित नहीं रही। समय के साथ दूसरा नाम भी इतना प्रचलित हुआ कि उसे सरकारी सूची में साथ रखना पड़ा।
3. शाहपुर उर्फ हाजीपट्टी—मिर्जापुर
मिर्जापुर का शाहपुर उर्फ हाजीपट्टी भी दो नामों वाले गांवों में शामिल है। जनगणना रिकॉर्ड में दोनों नाम एक साथ दर्ज हैं।
ऐसे नामों में अक्सर मुख्य गांव के साथ किसी पुरानी बस्ती या स्थानीय पहचान का नाम जुड़ा मिलता है। शाहपुर और हाजीपट्टी का साथ दर्ज होना इसी तरह की दोहरी पहचान का उदाहरण है।
4. खिरौरी उर्फ अशरफाबाद—मिर्जापुर
मिर्जापुर में ही खिरौरी उर्फ अशरफाबाद नाम का गांव दर्ज है। सरकारी जनगणना सूची में खिरौरी के साथ अशरफाबाद नाम भी दिया गया है।
यह नाम इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि आसपास के क्षेत्र में एक ही स्थान की पहचान अलग-अलग नामों से बनी रह सकती है। सरकारी रिकॉर्ड ने दोनों नामों को साथ दर्ज कर इस दोहरी पहचान को सुरक्षित रखा है।
5. जगतपुर उर्फ सुल्तानपुर—बुलंदशहर
बुलंदशहर जिले में जगतपुर उर्फ सुल्तानपुर नाम का गांव मिलता है। 2011 की जनगणना सूची में इसे इसी दोहरे नाम के साथ दर्ज किया गया है।
एक तरफ जगतपुर और दूसरी तरफ सुल्तानपुर—दोनों नाम एक ही गांव की पहचान बन गए। ऐसे गांवों के नाम स्थानीय इतिहास और प्रशासनिक रिकॉर्ड के बीच बने रिश्ते को भी दिखाते हैं।
6. मछीवाड़ा उर्फ कामागर—पंजाब
पंजाब के फिरोजपुर जिले में मछीवाड़ा उर्फ कामागर नाम दर्ज है। जनगणना के गांव संबंधी रिकॉर्ड में दोनों नाम साथ दिखाई देते हैं।
पंजाब में ऐसे दोहरे नाम वाले गांव अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देते हैं। यहां गांवों के नाम के साथ ‘उर्फ’ या ‘Alias’ जोड़कर पुरानी और दूसरी प्रचलित पहचान को दर्ज किया गया है।
7. जैमलवाला उर्फ प्यारेआना—फिरोजपुर
इसी जिले में जैमलवाला उर्फ प्यारेआना नाम का गांव है। सरकारी जनगणना रिकॉर्ड में यह नाम स्पष्ट रूप से दर्ज है।
दोनों नामों का साथ रहना यह बताता है कि किसी गांव की पहचान अलग-अलग समय या अलग-अलग स्थानीय समूहों में अलग नाम से प्रचलित हो सकती है। सरकारी रिकॉर्ड में दोनों को साथ रख दिया गया है ताकि गांव की पहचान में भ्रम न हो।
8. हौज उर्फ गैंडर—फिरोजपुर
फिरोजपुर का हौज उर्फ गैंडर भी दो नामों वाले गांव का उदाहरण है। जनगणना सूची में हौज के साथ गैंडर नाम दर्ज है।
ऐसे गांवों की खासियत यह है कि दूसरे नाम को केवल स्थानीय बोलचाल तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि वह आधिकारिक गांव सूची का हिस्सा बन गया।
9. टपरियां चक चाल उर्फ कुजल—रूपनगर
पंजाब के रूपनगर जिले में टपरियां चक चाल उर्फ कुजल नाम दर्ज है। यहां गांव का नाम और दूसरा प्रचलित नाम दोनों सरकारी सूची में साथ मिलते हैं।
यह नाम दिखाता है कि कई बार गांव की पहचान आसपास की जमीन, पुरानी बस्ती या स्थानीय नाम से भी जुड़ जाती है।
10. अकालगढ़ उर्फ बुर्जवाला—रूपनगर
रूपनगर में ही अकालगढ़ उर्फ बुर्जवाला गांव है। जनगणना रिकॉर्ड में अकालगढ़ के साथ बुर्जवाला नाम दर्ज है।
एक गांव, दो पहचान—यह व्यवस्था स्थानीय लोगों के लिए परिचित हो सकती है, लेकिन बाहर के व्यक्ति के लिए दोनों नाम अलग-अलग गांव होने का भ्रम पैदा कर सकते हैं। सरकारी सूची में दोनों नाम साथ दर्ज होने से यह पहचान स्पष्ट रहती है।
11. हरिपुर उर्फ रोमाजरा—रूपनगर
हरिपुर उर्फ रोमाजरा भी पंजाब के रूपनगर जिले का ऐसा गांव है, जिसके दो नाम सरकारी जनगणना रिकॉर्ड में मिलते हैं।
यहां दूसरा नाम केवल किसी व्यक्ति या स्थान के नाम जैसा नहीं बल्कि गांव की अलग पहचान के रूप में दर्ज है। ऐसे नाम पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों की पुरानी स्थानीय पहचान को समझने में मदद करते हैं।
12. संतपुर उर्फ चुपकी—रूपनगर
रूपनगर की सूची में संतपुर उर्फ चुपकी नाम भी मिलता है। गांव का आधिकारिक रिकॉर्ड दोनों नामों को साथ लेकर चलता है।
‘संतपुर’ और ‘चुपकी’ जैसे बिल्कुल अलग सुनाई देने वाले नाम यह सवाल भी खड़ा करते हैं कि समय के साथ गांवों के नाम कैसे बदलते और फैलते रहे होंगे। हालांकि हर गांव के नाम के पीछे की स्थानीय वजह अलग हो सकती है और उसके लिए अलग ऐतिहासिक रिकॉर्ड देखना जरूरी है।
13. रामगढ़ उर्फ डेकवाला—रूपनगर
रामगढ़ उर्फ डेकवाला भी दोहरे नाम वाला गांव है। सरकारी जनगणना रिकॉर्ड में दोनों नाम साथ दर्ज हैं।
रामगढ़ जैसे सामान्य नाम वाले गांवों के साथ दूसरा नाम जोड़ना प्रशासनिक पहचान को अलग करने का एक तरीका भी हो सकता है। इससे एक जैसे नाम वाले स्थानों में अंतर करना आसान होता है।
14. मुजफ्फरा उर्फ मंडपुरा—हरियाणा
हरियाणा के गुरुग्राम जिले की जनगणना सूची में मुजफ्फरा उर्फ मंडपुरा नाम दर्ज है।
यहां भी गांव की मुख्य पहचान के साथ दूसरा नाम सरकारी सूची का हिस्सा है। ऐसे नामों से पता चलता है कि एक गांव के लिए प्रचलित दो नाम कई दशकों तक साथ-साथ चल सकते हैं।
15. टिकरी उर्फ भूपगढ़—हरियाणा
हरियाणा के पलवल जिले में टिकरी उर्फ भूपगढ़ नाम का गांव जनगणना रिकॉर्ड में दर्ज है। गांव की सूची में टिकरी के साथ भूपगढ़ नाम भी दिया गया है।
इसी तरह हरियाणा की दूसरी सरकारी जनगणना सूचियों में रायपुर उर्फ सुंदरपुर और थाना आलम उर्फ मसीत जैसे नाम भी दर्ज मिलते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि दोहरे नाम केवल एक-दो गांवों की बात नहीं है।
आखिर गांवों के दो नाम क्यों पड़ते हैं?
गांवों के दो नाम होने की एक ही वजह नहीं होती। इसके पीछे स्थानीय इतिहास, पुरानी बस्ती का नाम, किसी व्यक्ति या परिवार से जुड़ी पहचान, दूसरी बस्ती का जुड़ना या लंबे समय से चल रहा स्थानीय नाम हो सकता है।
कई मामलों में सरकारी रिकॉर्ड पुराने नाम को बनाए रखता है, जबकि लोग दूसरे नाम से गांव को अधिक जानते हैं। कुछ जगह दोनों नाम इतने प्रचलित हो जाते हैं कि प्रशासनिक सूची में भी उन्हें साथ दर्ज कर दिया जाता है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। जनगणना रिकॉर्ड में ‘Alias’ या ‘Urf’ लिखा होना और अलग-अलग विभागों में अलग नाम दर्ज होना एक जैसी स्थिति नहीं है। पंजाब, हरियाणा, मिर्जापुर और दूसरे जिलों के ऊपर दिए उदाहरणों में दूसरा नाम सरकारी गांव सूची का हिस्सा है, जबकि खुचमा में अलग-अलग विभागों में अलग नाम दर्ज होने का मामला सामने आया है।
नाम में छिपी है गांव की कहानी
गांव का नाम सिर्फ पता नहीं होता। उसमें वहां की पुरानी बस्ती, लोगों की बोली, जमीन, इतिहास और स्थानीय पहचान की परतें छिपी होती हैं। इसलिए किसी गांव के दो नाम मिलना केवल प्रशासनिक विचित्रता नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत के बदलते इतिहास का संकेत भी हो सकता है।
चंदौली के खुचमा से लेकर पंजाब के जैमलवाला उर्फ प्यारेआना और हरियाणा के टिकरी उर्फ भूपगढ़ तक, ये नाम बताते हैं कि भारत के गांवों की पहचान हमेशा एक शब्द में नहीं सिमटी रही। कई बार एक गांव के साथ उसका पुराना नाम भी चलता रहा और वही नाम पीढ़ियों तक उसकी पहचान बन गया।
यही वजह है कि गांवों के नामों की पड़ताल केवल नक्शे पर किसी जगह को खोजने का काम नहीं है। यह उस जगह के इतिहास और लोगों की स्मृतियों तक पहुंचने का रास्ता भी है।



