जब संविधान बना सत्ता की सीमा: भारत के 12 ऐसे जज जिनके फैसलों ने सरकार और प्रशासन को जवाबदेह बनाया
केशवानंद भारती से एचआर खन्ना और अतुल श्रीधरन तक—इन न्यायाधीशों के फैसलों ने बताया कि लोकतंत्र में सरकार शक्तिशाली जरूर है, लेकिन संविधान से ऊपर नहीं

लोकतंत्र में सरकार के पास बड़ी ताकत होती है। संसद कानून बनाती है, केंद्र और राज्य सरकारें नीतियां लागू करती हैं और प्रशासन उन फैसलों को जमीन पर उतारता है। लेकिन इन सभी शक्तियों की एक सीमा है और वह सीमा तय करता है संविधान।
भारत की न्यायपालिका ने कई मौकों पर सरकारों और प्रशासन को याद दिलाया है कि सत्ता का इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता। कभी अदालत ने संसद की संविधान बदलने की शक्ति पर सीमा तय की, कभी आपातकाल के दौर में नागरिकों की आजादी का सवाल उठाया, कभी केंद्र को राज्यों की चुनी हुई सरकारों के मामले में सावधानी बरतने को कहा और कभी प्रशासन को बिना उचित प्रक्रिया के कार्रवाई करने से रोका।
इसी वजह से भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में कुछ ऐसे न्यायाधीशों के नाम बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं, जिनके फैसले आज भी संवैधानिक बहस का आधार हैं।
सही बात यह है कि इनके फैसलों ने सरकार और प्रशासन को संविधान की सीमाओं के भीतर काम करने के लिए मजबूर किया।
1. न्यायमूर्ति एचआर खन्ना: आपातकाल में अकेली लेकिन ऐतिहासिक आवाज

अगर भारतीय न्यायपालिका में स्वतंत्र सोच और न्यायिक साहस की बात हो तो न्यायमूर्ति हंस राज खन्ना का नाम सबसे पहले लिया जाता है।
1973 में केशवानंद भारती मामले में वह उन सात न्यायाधीशों में शामिल थे, जिन्होंने संसद की संविधान संशोधन शक्ति पर “बुनियादी ढांचे” की सीमा स्वीकार की। 1975-77 के आपातकाल के दौरान एडीएम जबलपुर मामले में उन्होंने बहुमत से अलग राय दी। उस समय बहुमत ने सरकार के पक्ष में फैसला दिया था, जबकि न्यायमूर्ति खन्ना ने नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के पक्ष में अपनी असहमति दर्ज की।
उनकी यह असहमति बाद में भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के उदाहरण के रूप में देखी गई।
क्यों महत्वपूर्ण?
क्योंकि उन्होंने यह सवाल उठाया कि क्या सरकार को आपातकाल के नाम पर किसी व्यक्ति की जिंदगी और आजादी पूरी तरह छीन लेने की खुली छूट मिल सकती है?
आज न्यायमूर्ति खन्ना की यही असहमति न्यायपालिका की स्वतंत्रता का प्रतीक मानी जाती है।
2. न्यायमूर्ति एसएम सीकरी: संसद की शक्ति पर पहली बड़ी संवैधानिक सीमा

मुख्य न्यायाधीश एसएम सीकरी ने 1973 में 13 न्यायाधीशों वाली ऐतिहासिक पीठ की अध्यक्षता की।
मामला था केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य। इस फैसले में सात न्यायाधीशों के बहुमत ने कहा कि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान के मूल ढांचे को खत्म नहीं कर सकती। इस सिद्धांत को बाद में Basic Structure Doctrine कहा गया।
यही वह फैसला था जिसने संसद की शक्ति के सामने संविधान की सर्वोच्चता की मजबूत रेखा खींची।
आसान भाषा में समझें
संसद संविधान बदल सकती है, लेकिन ऐसा बदलाव नहीं कर सकती जिससे संविधान की पहचान ही खत्म हो जाए।
यानी संसद शक्तिशाली है, लेकिन संविधान से बड़ी नहीं।
3. न्यायमूर्ति पीएन भगवती: आम आदमी को अदालत तक पहुंचाने वाले जज

न्यायमूर्ति पीएन भगवती भारतीय न्यायपालिका में जनहित याचिका और सामाजिक न्याय की न्यायिक सोच के विकास से जुड़े सबसे प्रमुख नामों में रहे।
मनका गांधी बनाम भारत संघ के मामले में उन्होंने व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक सुरक्षा को व्यापक रूप दिया। इस फैसले ने यह सोच मजबूत की कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने वाली सरकारी कार्रवाई केवल कानून के नाम पर उचित नहीं मानी जा सकती; प्रक्रिया भी उचित, निष्पक्ष और तर्कसंगत होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के बाद के फैसलों में भी इस सिद्धांत का लगातार उल्लेख हुआ है।
असर क्या पड़ा?
इसके बाद अनुच्छेद 21 केवल “जीने का अधिकार” भर नहीं रहा। इसके भीतर सम्मान के साथ जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े कई पहलुओं को जगह मिली।
यही वजह है कि बाद के दशकों में आम नागरिकों के अधिकारों से जुड़े अनेक फैसलों की नींव इस दौर में दिखाई देती है।
4. न्यायमूर्ति जेएस वर्मा: महिलाओं के अधिकारों के लिए अदालत ने बनाया रास्ता

न्यायमूर्ति जेएस वर्मा भारतीय न्यायपालिका के सबसे चर्चित संवैधानिक न्यायाधीशों में रहे।
उनका सबसे चर्चित योगदान विशाखा मामले से जुड़ा है। कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न को लेकर उस समय स्पष्ट कानून नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक अधिकारों और अंतरराष्ट्रीय मानकों को ध्यान में रखते हुए दिशा-निर्देश जारी किए।
बाद में इन्हीं दिशानिर्देशों ने कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े कानून के लिए आधार तैयार किया।
न्यायमूर्ति वर्मा की न्यायिक सोच की खासियत यह थी कि अदालत केवल पुराने कानूनों को पढ़ने तक सीमित न रहे, बल्कि संविधान में दिए अधिकारों को बदलती सामाजिक परिस्थितियों के संदर्भ में समझे।
5. न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह: केंद्र की ताकत पर राज्यों का सवाल

न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह का नाम एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक फैसले से जुड़ा है।
यह मामला केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन से संबंधित था। संविधान के अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल और चुनी हुई राज्य सरकारों को हटाने की शक्ति पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण सीमाएं तय कीं।
इस मामले की पीठ में न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह सहित नौ न्यायाधीश थे और फैसला 1994 में आया। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड में कुलदीप सिंह का फैसला दर्ज है।
क्यों महत्वपूर्ण?
इस फैसले के बाद राज्य सरकार को केवल राजनीतिक कारणों से हटाने के लिए केंद्र की कार्रवाई न्यायिक जांच से पूरी तरह बाहर नहीं रही।
यानी केंद्र के पास शक्ति जरूर है, लेकिन उस शक्ति का इस्तेमाल भी संविधान के दायरे में होना चाहिए।
6. न्यायमूर्ति एपी शाह: दिल्ली हाईकोर्ट से बदली सामाजिक सोच

दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एपी शाह का नाम नाज फाउंडेशन मामले के कारण इतिहास में दर्ज है।
2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने वयस्कों के बीच सहमति से समलैंगिक संबंधों को अपराध मानने वाले प्रावधान को संविधान के मूल अधिकारों की कसौटी पर पढ़ा और उसे उस सीमा तक असंवैधानिक माना। उस समय केंद्र सरकार के रुख में भी बदलाव को लेकर व्यापक बहस हुई थी।
बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में इस फैसले को पलट दिया, लेकिन 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने नवतेज सिंह जौहर मामले में फिर से उस आपराधिक प्रावधान को सहमति से संबंध रखने वाले वयस्कों पर लागू होने की सीमा तक असंवैधानिक ठहरा दिया।
इस तरह दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला आगे की संवैधानिक बहस का महत्वपूर्ण पड़ाव बना।
7. न्यायमूर्ति आरएफ नरिमन: इंटरनेट की आजादी और सरकार का कानून

न्यायमूर्ति रोहिंटन फली नरिमन संवैधानिक कानून के विशेषज्ञ न्यायाधीशों में गिने जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक प्रोफाइल के अनुसार उनके नाम 500 से अधिक रिपोर्टेड सुप्रीम कोर्ट फैसले दर्ज हैं और उन्हें तुलनात्मक संवैधानिक कानून का विशेषज्ञ बताया गया है।
उनके सबसे चर्चित फैसलों में श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ शामिल है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 66ए को असंवैधानिक घोषित कर दिया। इसका सीधा संबंध इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से था।
इसका मतलब
सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति की बात सरकार को पसंद न आए, केवल इस आधार पर उसे अस्पष्ट और बहुत व्यापक कानून के जरिए अपराध नहीं बनाया जा सकता।
यह फैसला डिजिटल दौर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बड़ी संवैधानिक मिसाल बना।
8. न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन: पहचान और सम्मान का अधिकार

न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन की पीठ ने 2014 में NALSA बनाम भारत संघ मामले में ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों को लेकर ऐतिहासिक फैसला दिया।
पीठ में न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति एके सीकरी शामिल थे। अदालत ने लैंगिक पहचान और सम्मान के साथ जीवन को संवैधानिक अधिकारों से जोड़ा।
यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की पहचान का सम्मान करना उसके गरिमापूर्ण जीवन का हिस्सा है।
इसने भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों की संवैधानिक बहस को नई दिशा दी।
9. न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर: पर्यावरण और प्रशासन पर सख्त निगरानी

न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर का नाम पर्यावरण, जंगल, खनन और कमजोर वर्गों से जुड़े मामलों में सक्रिय न्यायिक हस्तक्षेप के लिए जाना जाता है।
2018 में उनके नेतृत्व वाली पीठ ने हरियाणा के कांत एन्क्लेव में नियमों के विपरीत किए गए निर्माण को हटाने का आदेश दिया। अदालत ने पर्यावरणीय नुकसान और नियमों की अनदेखी को गंभीरता से लिया।
एक अन्य मामले में लोकुर की पीठ ने ओडिशा में बड़े पैमाने पर खनन और पर्यावरणीय नुकसान के मुद्दे पर सरकार तथा खनन गतिविधियों पर गंभीर सवाल उठाए।
उनके फैसलों का संदेश साफ था—
विकास के नाम पर पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
10. न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़: निजता को बनाया मौलिक अधिकार

न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ के सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक फैसलों में केएस पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ का नाम सबसे ऊपर आता है।
2017 में नौ न्यायाधीशों की पीठ ने सर्वसम्मति से माना कि निजता संविधान के तहत मौलिक अधिकार है। पीठ में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर के साथ न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर, एसए बोबडे, आरएफ नरिमन, एएम सप्रे, डीवाई चंद्रचूड़, एसके कौल और एसए नजीर शामिल थे।
इसका महत्व क्या है?
आज आपका फोन, आपकी निजी जानकारी, आपकी पसंद, आपका शरीर और आपकी व्यक्तिगत जिंदगी डिजिटल दुनिया से जुड़ी है।
ऐसे दौर में निजता को संवैधानिक अधिकार मानने का फैसला आने वाले दशकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण बन गया।
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की पीठ ने बाद में दिल्ली सरकार और केंद्र के बीच प्रशासनिक शक्तियों से जुड़े विवाद में भी निर्वाचित सरकार की भूमिका और संघीय ढांचे के सवालों पर महत्वपूर्ण फैसला दिया।
11. न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा: असहमति भी संविधान की ताकत

सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला वकील से सीधे सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश बनने वाली न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा का न्यायिक सफर भी खास है।
2018 के नवतेज सिंह जौहर मामले में वह पांच सदस्यीय पीठ का हिस्सा थीं। इस फैसले ने सहमति से संबंध रखने वाले वयस्कों पर धारा 377 के आपराधिक इस्तेमाल को असंवैधानिक ठहराया। पीठ में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, आरएफ नरिमन, एएम खानविलकर, डीवाई चंद्रचूड़ और इंदु मल्होत्रा शामिल थे।
उनका नाम सबरीमाला मामले में अलग राय के कारण भी खास तौर पर याद किया जाता है।
यह उदाहरण बताता है कि न्यायपालिका में असहमति भी संवैधानिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हर जज का बहुमत से सहमत होना जरूरी नहीं है।
12. न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन: उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक कार्रवाई पर कड़ी निगाह

इलाहाबाद हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार वह 11 नवंबर 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में न्यायाधीश के रूप में शामिल हुए। इससे पहले वह मध्य प्रदेश हाईकोर्ट और जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट में न्यायाधीश रहे। उनका जन्म 24 मई 1966 को हुआ था और उनकी सेवानिवृत्ति 23 मई 2028 को निर्धारित है।
उनका मौजूदा कार्यकाल अभी नया है, लेकिन 2026 में उनके कुछ फैसलों ने व्यापक ध्यान खींचा है।
एनएसए मामले में सख्त रुख
सितंबर 2026 में न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी से जुड़े राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के मामले में उसकी हिरासत को गैरकानूनी माना।
पीठ ने पांच लाख रुपये मुआवजे का आदेश दिया और इसे जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से वसूलने की बात कही। केंद्र की ओर से इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात सामने आई है।
लापता व्यक्ति मामले में सीबीआई जांच
इसी पीठ ने मुजफ्फरनगर के एक व्यक्ति के लापता होने के मामले में पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए और सीबीआई जांच का आदेश दिया। अदालत ने स्थानीय जांच को लेकर भरोसे की कमी के कारण केंद्रीय एजेंसी से जांच कराने का निर्देश दिया।
बुलडोजर कार्रवाई पर अहम टिप्पणी
जुलाई 2026 में न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की पीठ ने आरोपित व्यक्ति के घर को केवल सजा देने के उद्देश्य से गिराने को गलत माना। दोनों न्यायाधीश इस बात पर सहमत थे कि किसी आरोपी को दंड देने के लिए घर गिराना कार्यपालिका की शक्ति का दुरुपयोग हो सकता है।
हालांकि दोनों न्यायाधीश इस सवाल पर अलग हो गए कि एफआईआर दर्ज होने के बाद दो साल तक आरोपी के घर को गिराने पर पूर्ण रोक होनी चाहिए या नहीं। इसी मतभेद के कारण मामला तीसरे न्यायाधीश के पास भेजा गया।
यही वजह है कि न्यायमूर्ति श्रीधरन का नाम इस समय उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक कार्रवाई और नागरिक अधिकारों से जुड़े मामलों के संदर्भ में चर्चा में है।
इन 12 जजों के फैसलों में क्या समानता है?
इन सभी न्यायाधीशों के मामले एक जैसे नहीं हैं। किसी ने संसद की शक्ति की सीमा तय की, किसी ने नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा की, किसी ने पर्यावरण को महत्व दिया, किसी ने महिलाओं या ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों को मजबूती दी और किसी ने प्रशासनिक कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा की।
लेकिन इनके फैसलों में एक साझा विचार दिखाई देता है—
सरकार शक्तिशाली है, लेकिन उसकी शक्ति असीमित नहीं है।
भारतीय संविधान संसद, सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका—सभी को उनकी-अपनी सीमाएं देता है।
क्या सच में सरकार इन जजों से “खौफ” खाती है?
यह शब्द आकर्षक जरूर है, लेकिन तथ्यात्मक खबर में इससे बचना बेहतर है।
सरकार किसी अदालत के फैसले को चुनौती दे सकती है। अपील कर सकती है। पुनर्विचार मांग सकती है। कई बार अदालत का फैसला बाद में दूसरी पीठ बदल भी देती है।
इसलिए सही पत्रकारिता यह कहना है कि—
“इन जजों के फैसलों ने सरकार और प्रशासन की शक्तियों की संवैधानिक सीमाएं तय कीं।”
यही न्यायिक समीक्षा लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था है।
सबसे बड़ा उदाहरण: केशवानंद से श्रीधरन तक
1973 में केशवानंद भारती मामले ने कहा कि संविधान का मूल ढांचा संसद की संशोधन शक्ति से भी सुरक्षित है।
1976 में एचआर खन्ना की असहमति ने आपातकाल के दौर में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल उठाया।
1994 में एसआर बोम्मई मामले ने केंद्र-राज्य संबंधों और अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल पर महत्वपूर्ण संवैधानिक सीमाएं स्पष्ट कीं।
2017 में निजता को मौलिक अधिकार घोषित किया गया।
और 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन की पीठ ने प्रशासनिक शक्ति के इस्तेमाल पर कड़े सवाल उठाए।
इन सभी पड़ावों को जोड़ें तो एक तस्वीर सामने आती है—



