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1000 साल बाद भी खड़ा है तंजावूर का बृहदीश्वर मंदिर, 80 टन के पत्थर से लेकर ‘बिना नींव’ के दावे तक जानिए इंजीनियरिंग का रहस्य

एक ही पत्थर से बना विशाल नंदी भी है मंदिर की खास पहचान

तमिलनाडु के तंजावूर में खड़ा बृहदीश्वर मंदिर सिर्फ एक विशाल शिव मंदिर नहीं, बल्कि चोल काल की स्थापत्य प्रतिभा का ऐसा उदाहरण है जिसने एक हजार साल से अधिक समय बाद भी वास्तुकारों और इतिहासकारों को आकर्षित कर रखा है। विशाल ग्रेनाइट पत्थरों से बना इसका ऊंचा विमान, शीर्ष पर रखा विशाल पत्थर, एकाश्म नंदी और दीवारों पर उकेरी गई कलाकृतियां इसे दुनिया के असाधारण मंदिर स्थापत्य में शामिल करती हैं।

जब 11वीं सदी की शुरुआत में चोल सम्राट राजराजा प्रथम ने तंजावूर में बृहदीश्वर मंदिर बनवाया होगा, तब आधुनिक क्रेन, स्टील के ढांचे और भारी मशीनरी जैसी सुविधाएं मौजूद नहीं थीं। फिर भी आज से करीब एक हजार वर्ष पहले बनाया गया यह विशाल मंदिर आज भी मजबूती से खड़ा है।

इसी वजह से बृहदीश्वर मंदिर को अक्सर प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग का अद्भुत उदाहरण कहा जाता है। UNESCO के अनुसार मंदिर का निर्माण लगभग 1003-1004 ईस्वी में शुरू हुआ और 1009-1010 ईस्वी में इसका अभिषेक हुआ। मुख्य विमान (मंदिर का विशाल शिखर) जमीन से करीब 59.82 मीटर ऊंचा है।

चोल सम्राट राजराजा प्रथम ने बनवाया था भव्य मंदिर

सूर्यास्त के समय बृहदीश्वर मंदिर का भव्य विमान। स्रोत-इंटरनेट मीडिया

बृहदीश्वर मंदिर को तंजावूर का ‘बिग टेंपल’ और तमिल परंपरा में पेरुवुडैयार कोविल भी कहा जाता है। इसका निर्माण चोल शासक राजराजा प्रथम के शासनकाल में हुआ।

UNESCO के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार मंदिर को अभिलेखों में ‘दक्षिण मेरु’ (Dakshina Meru) के नाम से भी जाना जाता था। निर्माण की शुरुआत राजराजा प्रथम के शासन के लगभग 19वें वर्ष में और अभिषेक 25वें राजकीय वर्ष में हुआ।

यानी लगभग सात वर्ष के आसपास के समय में इतने विशाल परिसर का निर्माण पूरा करना अपने आप में असाधारण उपलब्धि थी।

216 फीट की ऊंचाई और 13 स्तरों वाला विमान

बृहदीश्वर मंदिर का विशाल विमान और शीर्ष पर स्थित शिखर संरचना। स्रोत-इंटरनेट मीडिया

मंदिर की सबसे प्रभावशाली विशेषता इसका मुख्य विमान है। यह गर्भगृह के ऊपर उठता हुआ विशाल पिरामिडनुमा टावर है।

UNESCO के विस्तृत विवरण में इसकी ऊंचाई 59.82 मीटर दर्ज है, जबकि विभिन्न लोकप्रिय स्रोत इसे लगभग 216 फीट यानी करीब 66 मीटर बताते हैं। ऊंचाई के आंकड़े माप की अलग-अलग पद्धतियों के कारण स्रोतों में अलग मिलते हैं। इसलिए लेख में UNESCO का लगभग 60 मीटर वाला आंकड़ा अधिक सुरक्षित है।

विमान में 13 प्रमुख ताल या स्तर हैं और इसके ऊपर शिखर का निर्माण किया गया है। इसकी सीधी, ऊपर की ओर घटती ज्यामितीय संरचना चोल द्रविड़ वास्तुकला की विशिष्ट पहचान है।

क्या मंदिर में बिल्कुल नींव नहीं है?

यही वह दावा है जो इंटरनेट पर बृहदीश्वर मंदिर को लेकर सबसे ज्यादा दोहराया जाता है।

कहा जाता है कि मंदिर के नीचे कोई पारंपरिक गहरी नींव नहीं है और पत्थरों को केवल ‘पजल सिस्टम’ की तरह एक-दूसरे में फंसाकर खड़ा किया गया है।

लेकिन इसे प्रमाणित तथ्य की तरह लिखना सही नहीं होगा।

UNESCO के दस्तावेज मंदिर के मुख्य मंदिर को एक विशाल पोडियम पर निर्मित बताता है और गर्भगृह के नीचे उपपीठ तथा अधिष्ठान जैसे संरचनात्मक हिस्सों का विवरण देता है।

इसलिए ज्यादा सटीक बात यह है कि मंदिर की संरचना पारंपरिक आधुनिक आरसीसी नींव जैसी नहीं है और इसकी भार-वहन प्रणाली विशाल पत्थर के पोडियम, अधिष्ठान तथा ऊपर की संरचनाओं के समन्वय पर आधारित है। ‘बिना नींव’ कहना लोकप्रिय सरलीकरण है, तकनीकी निष्कर्ष नहीं।

पत्थरों को जोड़ने की तकनीक बनी रहस्य का हिस्सा

बृहदीश्वर मंदिर का निर्माण मुख्य रूप से विशाल पत्थर के ब्लॉकों से हुआ है। UNESCO भी मंदिर को मुख्यतः ग्रेनाइट ब्लॉकों से निर्मित बताता है, हालांकि परिसर में ईंट के इस्तेमाल का भी उल्लेख है।

मंदिर की पत्थर की वास्तुकला में सटीक कटिंग, जोड़ और भार के संतुलन का महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन यह कहना कि पूरे मंदिर में कहीं भी किसी प्रकार का मोर्टार इस्तेमाल नहीं हुआ, उपलब्ध आधिकारिक स्रोतों से इस रूप में प्रमाणित नहीं है।

इसलिए इसे ‘बिना सीमेंट के मंदिर’ कहने के बजाय ‘विशाल पत्थर के ब्लॉकों पर आधारित जटिल संरचनात्मक प्रणाली’ कहना ज्यादा तथ्यपरक होगा।

80 टन के पत्थर ने बढ़ाया रहस्य

मंदिर के शीर्ष से जुड़ा सबसे प्रसिद्ध इंजीनियरिंग तथ्य है—एक विशाल ग्रेनाइट पत्थर।

विभिन्न स्थापत्य अध्ययनों और प्रकाशित स्रोतों में शीर्ष पर मौजूद विशाल पत्थर का वजन करीब 80 टन बताया जाता है। एक विस्तृत स्थापत्य विवरण इसे लगभग 7.77 मीटर वर्गाकार ग्रेनाइट ब्लॉक बताता है।

कल्पना कीजिए—हजार साल पहले इतने भारी पत्थर को मंदिर के ऊपरी हिस्से तक पहुंचाना कितना कठिन रहा होगा।

क्या 6 किलोमीटर का रैंप बनाया गया था?

लोकप्रिय विवरण में कहा जाता है कि सारापल्लम गांव की दिशा से लगभग छह किलोमीटर लंबा मिट्टी का रैंप बनाकर पत्थर को ऊपर खींचा गया।

यह विचार लंबे समय से प्रचलित है और कई लोकप्रिय लेख इसे निर्माण तकनीक के रूप में बताते हैं। लेकिन उपलब्ध UNESCO सामग्री इस रैंप को निर्माण की निश्चित और प्रमाणित तकनीक के रूप में दर्ज नहीं करती।

यानी इसे अंतिम वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।

क्या सचमुच विमान की छाया जमीन पर नहीं पड़ती?

तंजावूर का बृहदीश्वर मंदिर, चोलकालीन द्रविड़ वास्तुकला की विश्वप्रसिद्ध मिसाल। स्रोत-इंटरनेट मीडिया

बृहदीश्वर मंदिर से जुड़ा सबसे लोकप्रिय ‘रहस्य’ है कि इसके विशाल विमान की छाया दोपहर में जमीन पर नहीं पड़ती।

यह दावा भ्रामक है।

किसी भी विशाल वास्तु संरचना की तरह बृहदीश्वर मंदिर भी सूर्य की स्थिति के अनुसार छाया बनाता है। सूर्य की दिशा और ऊंचाई बदलने के साथ छाया की दिशा और लंबाई भी बदलती है।

इसलिए यह कहना कि “मंदिर के विमान की छाया कभी जमीन पर नहीं पड़ती” वैज्ञानिक तथ्य नहीं है।

असल आकर्षण मंदिर की ज्यामितीय संरचना, उसके ऊंचे पोडियम और विमान के अनुपात में है, जिसके कारण विशेष समय पर इसकी छाया को लेकर अलग-अलग दृश्य प्रभाव दिखाई दे सकते हैं।

एक ही पत्थर से बना विशाल नंदी

बृहदीश्वर मंदिर परिसर में एक ही पत्थर से निर्मित विशाल नंदी। स्रोत- इंटरनेट मीडिया

बृहदीश्वर मंदिर के सामने नंदी मंडप में स्थापित विशाल नंदी भी मंदिर की प्रमुख विशेषताओं में शामिल है।

प्रकाशित स्थापत्य विवरण के अनुसार यह एकाश्म यानी एक ही पत्थर से निर्मित नंदी है। इसकी लंबाई करीब छह मीटर और वजन लगभग 25 टन बताया जाता है।

गर्भगृह में विशाल शिवलिंग

मंदिर के गर्भगृह में विशाल शिवलिंग स्थापित है। उपलब्ध प्रकाशित विवरण इसे लगभग 8.7 मीटर यानी 29 फीट ऊंचा बताते हैं, हालांकि इसमें आधार और लिंग की संरचना को लेकर अलग-अलग स्रोतों में माप की पद्धति अलग हो सकती है।

UNESCO अपने आधिकारिक विवरण में इसे गर्भगृह के केंद्र में स्थित colossal linga बताता है।

दीवारों पर नृत्य की 81 मुद्राएं

मंदिर की दीवारों और वास्तु-अंगों पर उकेरी गई चोलकालीन शिल्पकला। स्रोत-इंटरनेट मीडिया

बृहदीश्वर मंदिर केवल ऊंचाई और विशाल पत्थरों के कारण ही महत्वपूर्ण नहीं है। इसकी दीवारों पर शिल्पकला का अद्भुत संसार दिखाई देता है।

UNESCO के अनुसार गर्भगृह के दूसरे स्तर की दीवारों पर भरतनाट्यम से संबंधित 108 कराणाओं में से 81 मुद्राएं उकेरी गई हैं।

यह उस समय की कला, नृत्य परंपरा और मंदिर वास्तुकला के बीच गहरे संबंध का प्रमाण है।

ग्रेनाइट कहां से आया?

मंदिर के निर्माण में बड़े पैमाने पर ग्रेनाइट का इस्तेमाल हुआ। तंजावूर का भौगोलिक क्षेत्र विशाल ग्रेनाइट शिलाखंडों के लिए प्रसिद्ध पहाड़ी क्षेत्र नहीं है, इसलिए इतने बड़े पत्थरों को निर्माण स्थल तक पहुंचाना भी चोलकालीन संगठन और परिवहन क्षमता का महत्वपूर्ण सवाल है।

हालांकि इंटरनेट पर अक्सर ‘100 किलोमीटर दूर से पत्थर लाए गए’ जैसे निश्चित आंकड़े दिए जाते हैं, ऐसे आंकड़े को बिना पुरातात्विक स्रोत के निश्चित तथ्य की तरह लिखना उचित नहीं है।

यही बृहदीश्वर मंदिर की खूबसूरती है—इसके निर्माण की तकनीक के कई पहलू समझे जा चुके हैं, लेकिन इतने विशाल निर्माण को उस समय कैसे व्यवस्थित किया गया, इस पर शोध और विमर्श आज भी जारी है।

UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल है मंदिर

बृहदीश्वर मंदिर को 1987 में UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया था। 2004 में इसके साथ गंगैकोंडचोलपुरम और दारासुरम के मंदिरों को मिलाकर संपत्ति का विस्तार किया गया और इसका नाम Great Living Chola Temples रखा गया।

UNESCO के अनुसार ये मंदिर चोल साम्राज्य की स्थापत्य, मूर्तिकला, चित्रकला और कांस्य कला की असाधारण उपलब्धियों के साक्षी हैं। यहां हजार साल से अधिक पुरानी पूजा और धार्मिक परंपराएं आज भी जारी हैं।

रहस्य से ज्यादा महत्वपूर्ण है इसकी प्रमाणित इंजीनियरिंग

बृहदीश्वर मंदिर को ‘रहस्यमयी मंदिर’ कहना आकर्षक जरूर है, लेकिन इसकी वास्तविक महानता उन चीजों में है जिन्हें पुरातात्विक और स्थापत्य स्रोत प्रमाणित करते हैं—विशाल ग्रेनाइट संरचना, सटीक ज्यामिति, 13-स्तरीय विमान, विशाल पोडियम, एकाश्म नंदी, विशाल शिवलिंग, उत्कृष्ट मूर्तिकला और चोलकालीन स्थापत्य की निरंतर परंपरा।

एक हजार साल बाद भी खड़ा यह मंदिर बताता है कि आधुनिक मशीनों के अभाव में भी योजनाबद्ध निर्माण, गणितीय समझ, कुशल कारीगरी और विशाल श्रमबल के सहारे कितनी असाधारण संरचनाएं बनाई जा सकती थीं।

बृहदीश्वर मंदिर का सबसे बड़ा ‘रहस्य’ शायद यह नहीं कि इसकी छाया कहां जाती है, बल्कि यह है कि एक हजार साल पहले इंसान ने पत्थर, गणित और वास्तुज्ञान के सहारे इतनी विशाल कल्पना को वास्तविकता में कैसे बदल दिया।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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