रूपकुंड का अनसुलझा रहस्य: 1,000 साल के अंतर पर मरे लोग और भूमध्यसागर से कनेक्शन, जानिए ‘कंकाल झील’ का असली सच
देवभूमि उत्तराखंड के चमोली जिले में समुद्र तल से लगभग 5,029 मीटर (16,499 फीट) की ऊंचाई पर त्रिशूल पर्वतमाला के बीच एक छोटी और उथली हिमानी झील स्थित है। इस झील का नाम है रूपकुंड। वैसे तो हिमालय की वादियां अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जानी जाती हैं, लेकिन यह झील दुनिया भर में अपनी रहस्यमयी पहचान “कंकाल झील” (Skeleton Lake) के रूप में बना चुकी है।
अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित होने के कारण यहाँ साल के अधिकांश समय बर्फ जमी रहती है। गर्मियों में जब बर्फ की परत पिघलती है, तो झील के किनारों और आसपास इंसानी हड्डियाँ और कंकाल बिखरे दिखाई देने लगते हैं। लेकिन आखिर इतने दुर्गम इलाके में ये कंकाल कहाँ से आए और ये लोग कौन थे?
कंकाल एक ही घटना के नहीं: डीएनए शोध में बड़ा खुलासा

Photo: Schwiki / Wikimedia Commons / CC BY-SA 4.0वर्षों तक यही माना जाता रहा कि किसी एक भयंकर प्राकृतिक आपदा या युद्ध में सैकड़ों लोग एक साथ मारे गए होंगे। हालांकि, वर्ष 2019 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका Nature Communications में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय शोध ने इस पुरानी धारणा को पूरी तरह बदल दिया।
वैज्ञानिकों ने 38 मानव कंकालों के प्राचीन डीएनए (Ancient DNA) का विश्लेषण किया, जिसमें 23 पुरुष और 15 महिलाएँ शामिल थीं। इस अध्ययन से दो बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए:
- तीन अलग-अलग आनुवंशिक समूह: 23 कंकालों का संबंध दक्षिण एशियाई (भारतीय) मूल से था, 14 लोग पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र (यूरोप/ग्रीस) से थे, और 1 व्यक्ति का आनुवंशिक संबंध दक्षिण-पूर्व एशिया से पाया गया।
- 1,000 साल का समयांतराल: रेडियोकार्बन डेटिंग से पता चला कि भारतीय मूल के लोग लगभग 800 ईस्वी के आसपास यहाँ आए थे, जबकि भूमध्यसागरीय मूल के लोग लगभग 1800 ईस्वी के आसपास। यानी इन दोनों समूहों की मौतों के बीच करीब एक हजार साल का अंतर था!
फिर कैसे हुई इन लोगों की मौत?
यह खोज साबित करती है कि यह किसी एक दिन हुआ हादसा नहीं था। तो फिर अलग-अलग दौर में इन लोगों की मौत कैसे हुई?
- क्या भारी ओलावृष्टि कारण थी? पुरानी मानवशास्त्रीय जांचों में कुछ खोपड़ियों पर गोल और भारी वस्तुओं की मार के निशान मिले थे, जिससे अंदाज़ा लगाया गया था कि क्रिकेट की गेंद जितने बड़े ओलों की चपेट में आने से इनकी मौत हुई होगी। हालांकि, वैज्ञानिक इसे सभी मृतकों के लिए अंतिम कारण नहीं मानते।
- क्या कोई महामारी फैली थी? शोध में जीवाणु (Bacterial) संक्रमण या महामारी के ठोस प्रमाण नहीं मिले हैं।
- क्या ये सैनिक थे? मृतकों में पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं के अवशेष मिलना और पारिवारिक रिश्ते न होना किसी सैन्य अभियान के सिद्धांत को कमजोर करता है।
- तीर्थयात्रियों की संभावना: चूंकि रूपकुंड क्षेत्र ऐतिहासिक ‘नंदा देवी राजजात यात्रा’ के मार्ग से जुड़ा हुआ है, इसलिए संभावना है कि 800 ईस्वी के आसपास यहाँ आने वाले लोग धार्मिक यात्रा से जुड़े हो सकते हैं।
राजा-रानी की लोककथा और जमीनी हकीकत

Photo: Neha iitb / Wikimedia Commons / CC BY-SA 4.0स्थानीय गढ़वाली लोककथाओं के अनुसार, कन्नौज के राजा जसधवल और उनकी गर्भवती पत्नी रानी बलपा अपने दलबल और नर्तकियों के साथ नंदा देवी की यात्रा पर निकले थे। यात्रा में ढोल-नगाड़ों और उत्सव से माँ नंदा देवी रुष्ट हो गईं और भयंकर ओलावृष्टि से पूरा लश्कर नष्ट हो गया।
हालांकि, यह कहानी स्थानीय आस्था का हिस्सा है, लेकिन वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार एक ही घटना में सभी कंकालों के जमा होने की बात सिद्ध नहीं होती।
भ्रम बनाम वास्तविकता
आमतौर पर लोकप्रिय लेखों में दावा किया जाता है कि “बर्फ पिघलते ही सैकड़ों कंकाल पानी में तैरने लगते हैं।” वास्तविकता इससे थोड़ी अलग है। अवशेष मुख्य रूप से झील के किनारों, मलबे और आसपास की पथरीली ज़मीन पर फैले हुए हैं, जो बर्फ हटने पर नज़र आते हैं।
असली पहेली अभी भी बरकरार
2019 के वैज्ञानिक शोध ने पुराने रहस्यों के जवाब तो दिए, लेकिन एक नया सवाल खड़ा कर दिया—आखिर 1,000 साल के अंतर पर, हजारों किलोमीटर दूर भूमध्य सागर से लोग इस अत्यंत दुर्गम और वीरान हिमालयी ऊंचाई तक क्यों पहुंचे थे और उनकी जान किन परिस्थितियों में गई? यही सवाल आज भी रूपकुंड को दुनिया की सबसे बड़ी पुरातात्विक पहेलियों में से एक बनाए हुए है।



