गुजरात के गरबा से बस्तर के दशहरे तक, ऐसे बदलता है नवरात्र का रंग
नौ दिनों में देवी के नौ रूपों की पूजा, लेकिन देश के अलग-अलग हिस्सों में उत्सव का रंग और तरीका बिल्कुल अलग।

भारत में त्योहारों की खूबसूरती यही है कि एक ही पर्व अलग-अलग राज्यों में पहुंचकर अपना नया रूप ले लेता है। नवरात्र इसका सबसे शानदार उदाहरण है। कहीं नौ रातें गरबा और डांडिया की थाप पर गुजरती हैं, कहीं विशाल दुर्गा प्रतिमाओं और पंडालों के बीच शहर जगमगाता है। कहीं मंदिरों में घंटियां गूंजती हैं तो कहीं रामलीला के मंच पर राम और रावण की कथा जीवंत हो उठती है।
नवरात्र का धार्मिक आधार देवी शक्ति की आराधना और महिषासुर पर देवी दुर्गा की विजय की कथा से जुड़ा है। लेकिन सदियों के दौरान अलग-अलग क्षेत्रों ने इसे अपनी लोकसंस्कृति, परंपरा और सामाजिक जीवन के रंगों में ढाल दिया।
यही वजह है कि गुजरात का गरबा, बंगाल की दुर्गा पूजा, उत्तर भारत की रामलीला, मैसूर का दशहरा और तमिलनाडु का गोलू—सभी नवरात्र से जुड़े होने के बावजूद एक-दूसरे से बिल्कुल अलग नजर आते हैं।
नौ रातों का पर्व आखिर नवरात्र क्यों कहलाता है?
‘नवरात्र’ का अर्थ है—नौ रातें। शारदीय नवरात्र आश्विन शुक्ल पक्ष में मनाया जाता है। इन नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है।
इन रूपों को नवदुर्गा कहा जाता है—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री।
नवरात्र के पीछे प्रचलित धार्मिक कथा में देवी दुर्गा और महिषासुर के बीच युद्ध का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि नौ दिनों तक चले युद्ध के बाद देवी ने महिषासुर का वध किया। दसवें दिन की विजय को विजयादशमी या दशहरा के रूप में मनाया जाता है।
लेकिन भारत में इस विजय की कथा भी एक जैसी नहीं दिखाई देती। किसी क्षेत्र में देवी की विजय केंद्र में है तो किसी क्षेत्र में राम की रावण पर विजय।
गुजरात में नौ रातें बन जाती हैं गरबा की महफिल
गुजरात में नवरात्र का नाम लेते ही आंखों के सामने रंग-बिरंगे परिधान, घूमते हुए कदम और ढोल की थाप का दृश्य उभरता है।
यहां गरबा और डांडिया नवरात्र की पहचान बन चुके हैं। लोग पारंपरिक कपड़े पहनकर खुले मैदानों में इकट्ठा होते हैं। बीच में दीप या देवी का प्रतीक रखा जाता है और उसके चारों ओर गोल घेरे में गरबा किया जाता है।
गरबा केवल नृत्य नहीं है। इसके केंद्र में रखे दीप को जीवन और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। घेरे में घूमते लोग मानो उस शक्ति के चारों ओर अपनी आस्था व्यक्त करते हैं।
शाम ढलते ही शुरू होने वाला गरबा कई जगह आधी रात तक चलता है। आधुनिक संगीत और बड़े आयोजनों के बावजूद पारंपरिक गरबा की मूल भावना आज भी कायम है।
बंगाल में नवरात्र का दूसरा नाम है दुर्गा पूजा
अगर गुजरात में नवरात्र नृत्य है तो पश्चिम बंगाल में यह दुर्गा पूजा की भव्यता बन जाता है।
कोलकाता की गलियों में नवरात्र के दौरान बने पंडाल किसी कला प्रदर्शनी से कम नहीं होते। अलग-अलग थीम पर बनाए गए पंडाल, देवी दुर्गा की आकर्षक प्रतिमाएं, रोशनी और ढाक की आवाज वातावरण को पूरी तरह बदल देती है।
यहां दुर्गा पूजा के प्रमुख दिन षष्ठी से दशमी तक विशेष उत्साह के साथ मनाए जाते हैं। दशमी को सिंदूर खेला और इसके बाद प्रतिमा विसर्जन के साथ उत्सव का समापन होता है।
2021 में कोलकाता की दुर्गा पूजा को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में शामिल किया गया, जिससे इसकी सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर भी मान्यता मिली।
उत्तर भारत में नवरात्र: व्रत से रामलीला तक
उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के कई हिस्सों में नवरात्र के दौरान व्रत, देवी पूजा और रामलीला प्रमुख आकर्षण होते हैं।
घरों में कलश स्थापना की जाती है। लोग नौ दिनों तक उपवास रखते हैं। मंदिरों में देवी के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। अष्टमी और नवमी पर कन्या पूजन की परंपरा भी कई जगह देखने को मिलती है।
इसी दौरान शहरों और गांवों में रामलीला का मंचन होता है। नौ दिनों तक रामकथा के अलग-अलग प्रसंग दिखाए जाते हैं और दशमी के दिन रावण दहन के साथ इसका समापन होता है।
इस तरह उत्तर भारत में नवरात्र देवी आराधना से शुरू होकर राम की विजय के उत्सव तक पहुंचता है।
मैसूर में नवरात्र का राजसी अंदाज
कर्नाटक का मैसूर दशहरा नवरात्र से जुड़े सबसे आकर्षक आयोजनों में शामिल है।
यहां देवी चामुंडेश्वरी की पूजा प्रमुख है। मैसूर पैलेस की भव्य सजावट, रोशनी, सांस्कृतिक कार्यक्रम और जंबू सवारी इस उत्सव को राजसी स्वरूप देते हैं।
सजे हुए हाथियों के साथ निकलने वाला जुलूस देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। इसकी परंपरा मैसूर के राजवंश से भी जुड़ी हुई है।
यहां नवरात्र केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि इतिहास, राजपरंपरा और लोकसंस्कृति का सार्वजनिक उत्सव बन जाता है।
तमिलनाडु में नौ सीढ़ियों पर बसती है एक अलग दुनिया
तमिलनाडु में नवरात्र का एक अनोखा रूप देखने को मिलता है—गोलू या कोलू।
घरों में सीढ़ीनुमा मंच बनाकर उस पर देवी-देवताओं, पशु-पक्षियों, राजाओं और आम जीवन से जुड़े पात्रों की गुड़ियां सजाई जाती हैं।
इन सजावटों में धार्मिक कथाओं के साथ-साथ रोजमर्रा के जीवन की झलक भी दिखाई देती है। परिवार और पड़ोसी एक-दूसरे के घर गोलू देखने जाते हैं। भजन और संगीत भी इस परंपरा का हिस्सा हैं।
यानी जहां गुजरात में नवरात्र में कदम थिरकते हैं, वहीं तमिलनाडु में गुड़ियों के जरिए कहानियां सजाई जाती हैं।
तेलंगाना में फूलों का उत्सव है बथुकम्मा
तेलंगाना में नवरात्र के आसपास बथुकम्मा का उत्सव विशेष पहचान रखता है।
महिलाएं विभिन्न प्रकार के फूलों को सजाकर विशेष आकृति बनाती हैं। इसके चारों ओर गीत और नृत्य होते हैं। फूलों की यह परंपरा प्रकृति और स्थानीय संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई है।
बथुकम्मा इस बात का उदाहरण है कि भारतीय त्योहारों में धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति और लोकजीवन भी कितनी मजबूती से जुड़े हैं।
आंध्र प्रदेश में देवी कनक दुर्गा का अलौकिक रूप
आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में कनक दुर्गा मंदिर नवरात्र का प्रमुख केंद्र है।
नवरात्र के दौरान देवी को अलग-अलग रूपों और अलंकरणों में सजाया जाता है। विशेष पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं।
कृष्णा नदी के किनारे स्थित मंदिर और आसपास का धार्मिक वातावरण नवरात्र को यहां एक अलग आध्यात्मिक स्वरूप देता है।
बस्तर में दशहरा की कहानी ही अलग है
छत्तीसगढ़ का बस्तर दशहरा इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि भारत में दशहरा हर जगह रावण दहन का पर्व नहीं है।
बस्तर में इसकी परंपरा स्थानीय देवी-देवताओं, जनजातीय संस्कृति और राजपरंपरा से जुड़ी है। विशाल रथ, स्थानीय अनुष्ठान और विभिन्न समुदायों की भागीदारी इस उत्सव को विशिष्ट बनाती है।
यहां दशहरा की परंपरा में रावण दहन प्रमुख केंद्र नहीं है। इसलिए बस्तर की परंपरा भारतीय त्योहारों की विविधता को समझने का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
हिमाचल के कुल्लू में देवताओं का महाकुंभ
हिमाचल प्रदेश का कुल्लू दशहरा भी अपनी अलग पहचान रखता है। यहां आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में देवी-देवताओं की पालकियां और रथ उत्सव में शामिल होते हैं।
कुल्लू की घाटी में जब अलग-अलग गांवों के देवता एक जगह पहुंचते हैं तो पूरा वातावरण लोकसंगीत, धार्मिक अनुष्ठानों और सामुदायिक उत्सव में बदल जाता है।
यह आयोजन बताता है कि पहाड़ी समाज में देवी-देवताओं की परंपरा किस तरह सामुदायिक जीवन का हिस्सा बनी हुई है।
एक नवरात्र, लेकिन कितनी अलग कहानियां?
| क्षेत्र | नवरात्र/दशहरा का प्रमुख रूप | खास पहचान |
|---|---|---|
| गुजरात | गरबा-डांडिया | सामूहिक नृत्य |
| पश्चिम बंगाल | दुर्गा पूजा | भव्य पंडाल व प्रतिमा |
| उत्तर भारत | देवी पूजा, रामलीला | व्रत, कन्या पूजन, रावण दहन |
| कर्नाटक | मैसूर दशहरा | राजसी जुलूस |
| तमिलनाडु | गोलू/कोलू | गुड़ियों की सजावट |
| तेलंगाना | बथुकम्मा | फूलों का उत्सव |
| आंध्र प्रदेश | कनक दुर्गा पूजा | देवी का विशेष अलंकरण |
| हिमाचल | कुल्लू दशहरा | देवताओं का समागम |
| छत्तीसगढ़ | बस्तर दशहरा | जनजातीय व स्थानीय परंपरा |
नौ देवियां और उनके पीछे छिपा भाव
नवरात्र के नौ दिनों में पूजी जाने वाली नवदुर्गा को केवल अलग-अलग देवी रूपों के रूप में नहीं देखा जाता। भारतीय धार्मिक परंपरा में उनके साथ अलग-अलग भाव भी जुड़े हैं।
शैलपुत्री से आरंभ होने वाली साधना सिद्धिदात्री तक पहुंचती है। इस क्रम को शक्ति, तप, साहस, सृजन, मातृत्व, विजय, अंधकार पर नियंत्रण, शुद्धता और सिद्धि जैसे भावों से जोड़ा जाता है।
इसीलिए नवरात्र में नौ दिन का उपवास या पूजा केवल एक धार्मिक अनुशासन नहीं, बल्कि आत्मसंयम और साधना की परंपरा भी माना जाता है।
नवरात्र का सबसे बड़ा संदेश: विविधता में एकता
नवरात्र की सबसे दिलचस्प बात यह है कि भारत में इसकी कोई एक तस्वीर नहीं है।
गुजरात में देवी की आराधना के बीच गरबा है। बंगाल में दुर्गा की प्रतिमा है। उत्तर भारत में रामलीला है। मैसूर में राजसी जुलूस है। तमिलनाडु में गोलू की गुड़ियां हैं। तेलंगाना में फूलों की सजावट है और बस्तर में जनजातीय परंपराओं की अपनी दुनिया।
रूप अलग हैं, कथाएं अलग हैं, अनुष्ठान अलग हैं—लेकिन इनके भीतर शक्ति, विजय, आस्था और सामुदायिक सहभागिता का भाव एक साझा सूत्र की तरह दिखाई देता है।
यही नवरात्र को केवल धार्मिक पर्व नहीं रहने देता। यह भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की उस तस्वीर को सामने लाता है जिसमें एक ही उत्सव के भीतर अनेक भारत दिखाई देते हैं।
फोटो स्रोत-इंटरनेट मीडिया



