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ऐसे जंगल जहां के पेड़ काटना है वर्जित, आस्था ने बचा रखी है सदियों पुरानी हरियाली

कहीं जंगल में पेड़ काटना देवता को नाराज करना माना जाता है तो कहीं सूखी लकड़ी उठाने पर भी सामाजिक रोक, भारत के इन पवित्र वनों में आज भी प्रकृति की रक्षा करती हैं सदियों पुरानी परंपराएं

भारत में जंगलों की कहानी केवल पेड़, पहाड़ और वन्यजीवों की कहानी नहीं है। देश के कई हिस्सों में जंगलों को देवताओं का निवास माना गया और उन्हें काटने से बचाने के लिए ऐसी परंपराएं बनीं, जो आज भी कायम हैं। इन जंगलों को कहीं देववन, कहीं देवराई, कहीं सरना, कहीं कावू तो कहीं ओरान कहा जाता है।

दिलचस्प बात यह है कि आधुनिक पर्यावरण संरक्षण की अवधारणा आने से बहुत पहले स्थानीय समुदायों ने इन छोटे-बड़े वन क्षेत्रों को सुरक्षित रखने के अपने नियम बना लिए थे। कई जगह पेड़ काटना, शाखा तोड़ना, फूल-पत्तियां तोड़ना या वन से कोई चीज ले जाना भी वर्जित माना जाता है।

सरकार की एक रिपोर्ट में देश के अलग-अलग राज्यों में ऐसे सैकड़ों पवित्र वन क्षेत्रों का उल्लेख है। महाराष्ट्र में इन्हें देवराई या देवगुड़ी, केरल में कावू, राजस्थान में ओरान, झारखंड में सरना और मेघालय में ख्लाव किंतांग जैसे नामों से जाना जाता है।

1. मेघालय के पवित्र जंगल, जहां पेड़ काटना माना जाता है देवता का अपमान

मेघालय के खासी और जयंतिया पहाड़ियों में मौजूद पवित्र वन भारत के सबसे रोचक उदाहरणों में गिने जाते हैं। इन्हें स्थानीय रूप से ख्लाव किंतांग, लॉ किंतांग और लॉ लिंगदोह कहा जाता है।

यहां की मान्यता के अनुसार जंगल में देवता का वास होता है। इसलिए पेड़ काटना, फूल तोड़ना, फल या टहनी ले जाना भी वर्जित माना जाता है। स्थानीय विश्वास है कि ऐसा करने से देवता नाराज हो सकते हैं। मेघालय जैव विविधता बोर्ड के अनुसार राज्य में ऐसे 79 पवित्र वन दर्ज किए गए थे और इनमें कई दुर्लभ वनस्पतियां पाई जाती हैं।

रहस्यमयी तथ्य: यहां जंगल की हरियाली को बचाने के लिए किसी सरकारी चौकी से ज्यादा ताकत स्थानीय आस्था की रही है।

2. कर्नाटक के देवरकाडु, देवताओं के नाम पर बचा जंगल

कर्नाटक के कोडागु क्षेत्र का देवरकाडु, जहां आस्था से जुड़े जंगलों को पीढ़ियों से संरक्षित किया जाता रहा है।

कर्नाटक के पश्चिमी घाट क्षेत्र में पवित्र वनों को देवरकाडु, देवरबाना, नागबाना आदि नामों से जाना जाता है। खासकर कोडागु क्षेत्र में इनका लंबा इतिहास रहा है।

इन जंगलों के छोटे हिस्सों में पेड़ काटने या दूसरे वन उत्पाद निकालने पर परंपरागत रोक रही है। एक अध्ययन में पश्चिमी घाट के कई छोटे पवित्र वनों को पूरी तरह संरक्षित बताया गया है, जहां पेड़ काटने या जैविक सामग्री निकालने की अनुमति नहीं होती।

कोडागु में देवरकाडु की बड़ी संख्या दर्ज की गई है। इन जंगलों का संबंध स्थानीय देवताओं और गांवों की धार्मिक परंपराओं से है।

रोचक तथ्य: कुछ देवरकाडु इतने पुराने हैं कि उनके संरक्षण की परंपरा आधुनिक वन कानूनों से कई पीढ़ियां पहले से चली आ रही है।

3. झारखंड का सरना, जहां पेड़ देवता के समान

झारखंड में सरना स्थल प्रकृति पूजा और जंगल संरक्षण की पुरानी परंपरा से जुड़े हैं।

झारखंड के आदिवासी गांवों में सरना पवित्र वन क्षेत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां साल और करम जैसे पेड़ों की पूजा की जाती है।

झारखंड वन विभाग के अनुसार सरंडा क्षेत्र के आदिवासी गांवों में सरना स्थल पाए जाते हैं और जंगल तथा पेड़ों का संरक्षण स्थानीय संस्कृति का हिस्सा है।

सरना केवल पेड़ों का समूह नहीं है। यह पूजा, त्योहार और सामुदायिक जीवन का केंद्र भी है। साल वृक्ष से जुड़ी परंपराएं यहां विशेष महत्व रखती हैं।

रहस्यमयी तथ्य: जिस पेड़ को दूसरे जंगलों में सामान्य वनस्पति माना जा सकता है, वही सरना में धार्मिक पहचान का हिस्सा बन जाता है।

4. राजस्थान के ओरान, रेगिस्तान में हरियाली के प्रहरी

रेगिस्तान के बीच जंगल बचाने की कल्पना ही अपने आप में असाधारण लगती है। राजस्थान में ओरान या देवबनी ऐसे ही पवित्र सामुदायिक वन क्षेत्र हैं।

इनका संबंध स्थानीय देवी-देवताओं, संतों और जल स्रोतों से रहा है। राजस्थान वन विभाग के दस्तावेज में ओरान, देवबनी और दूसरे पवित्र वन क्षेत्रों का उल्लेख मिलता है।

ओरान में पेड़ काटने पर स्थानीय सामाजिक और धार्मिक रोक रही है। यहां पशुओं के लिए चराई, जल संरक्षण और जैव विविधता का भी महत्व है। कुछ ओरान सैकड़ों वर्षों से समुदायों द्वारा संरक्षित बताए जाते हैं।

दिसंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के ओरान और ऐसे अन्य पवित्र वन क्षेत्रों की पहचान और संरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण निर्देश दिए। अदालत ने इनके पारिस्थितिक और सांस्कृतिक महत्व को भी रेखांकित किया।

5. केरल के कावू, छोटे जंगलों में छिपी बड़ी जैव विविधता

केरल में पवित्र वनों को कावू कहा जाता है। ये अक्सर गांवों, घरों या मंदिरों के आसपास छोटे-छोटे वन क्षेत्र के रूप में दिखाई देते हैं।

केरल वन विभाग के अनुसार कई कावू में दुर्लभ और स्थानीय वनस्पतियां मिलती हैं। ये जल स्रोतों, मिट्टी और स्थानीय पारिस्थितिकी के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।

कई कावू में नाग देवता से जुड़ी मान्यताएं हैं। इन्हें सर्प कावू भी कहा जाता है।

रोचक तथ्य: आकार में छोटा होने के बावजूद एक कावू आसपास के बड़े वन क्षेत्र जैसी जैव विविधता का आश्रय दे सकता है।

6. महाराष्ट्र की देवराई, जहां जंगल भगवान के नाम

महाराष्ट्र में पवित्र वनों को देवराई, देवर्हाटी और देवगुड़ी जैसे नामों से जाना जाता है। भारत सरकार की पर्यावरण रिपोर्ट में महाराष्ट्र में ऐसे 1,559 पवित्र वन क्षेत्रों का उल्लेख मिलता है।

इन क्षेत्रों में स्थानीय देवता या ग्राम देवता की मान्यता जुड़ी होती है। पेड़ों की कटाई पर परंपरागत रोक इन जंगलों को बचाने का प्रमुख माध्यम रही है।

महाराष्ट्र वन विभाग भी देवराई को पारंपरिक प्रकृति संरक्षण की महत्वपूर्ण परंपरा मानता है।

7. तमिलनाडु के कोविल काडु, मंदिर से जुड़ी हरियाली

तमिलनाडु में पवित्र वनों को कोविल काडु या कोइल काडु कहा जाता है। यहां ‘काडु’ का अर्थ जंगल और ‘कोविल’ का संबंध मंदिर से है।

इन वन क्षेत्रों का संबंध स्थानीय मंदिरों और देवी-देवताओं से रहा है। तमिलनाडु सरकार ने ऐसे पवित्र वन क्षेत्रों की पहचान और जैव विविधता का भौगोलिक दस्तावेज तैयार करने की परियोजना भी शुरू की थी।

कई जगह स्थानीय मान्यताओं के कारण इन जंगलों में पेड़ों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक उपयोग से बचा जाता है।

8. हिमाचल के देववन, जहां जंगल भी देवता की संपत्ति

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू और शिमला सहित कई क्षेत्रों में पवित्र वनों को देववन या देवता का जंगल कहा जाता है।

हिमाचल प्रदेश जैव विविधता बोर्ड के अध्ययन में कुल्लू और शिमला के 239 पवित्र वन क्षेत्रों का दस्तावेजीकरण किया गया था। इन जंगलों का प्रबंधन कई स्थानों पर मंदिर समितियों से जुड़ा रहा है।

कई देववनों में प्राकृतिक जल स्रोत भी पाए जाते हैं। स्थानीय मान्यताओं और नियमों ने इन क्षेत्रों को लंबे समय तक संरक्षित रखने में भूमिका निभाई है।

रोचक तथ्य: हिमाचल के कुछ गांवों में देवता को जंगल का स्वामी माना जाता है और ग्रामीण स्वयं को केवल उसका संरक्षक समझते हैं।

9. उत्तराखंड के देववन, पहाड़ों में आस्था की हरियाली

उत्तराखंड में पवित्र वन क्षेत्रों को अलग-अलग इलाकों में देवभूमि, देववन आदि नामों से जाना जाता है। राज्य जैव विविधता बोर्ड के अनुसार पवित्र वन ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें समुदाय धार्मिक और सांस्कृतिक विश्वास के आधार पर अपेक्षाकृत अछूता रखते हैं।

कुछ स्थानों पर पेड़ों की कटाई, वनस्पति हटाने और दूसरे संसाधनों के उपयोग पर सामाजिक रोक रही है।

पहाड़ी क्षेत्रों में इन जंगलों का महत्व केवल धार्मिक नहीं है। वे मिट्टी, पानी और स्थानीय जैव विविधता के संरक्षण में भी योगदान देते हैं।

10. गोवा के देवराई, जंगल के बीच छिपे रहस्य

गोवा को आमतौर पर समुद्र तटों के लिए जाना जाता है, लेकिन यहां पवित्र वनों की भी पुरानी परंपरा है। इन्हें देवराई या पन्न कहा जाता है।

गोवा वन विभाग ने कई पवित्र वनों का विवरण दर्ज किया है। इनमें सत्तारी क्षेत्र का निरंकाराचिराई भी शामिल है, जिसे लगभग 250 वर्ष पुराना बताया गया है।

कोपर्डेम की देवराई में प्राकृतिक जल स्रोत, पक्षियों के आवास और कई वनस्पतियां मिलती हैं।

रहस्यमयी तथ्य: गोवा की एक देवराई में अमावस्या की रात जमीन पर चमकने वाले कवक की प्राकृतिक घटना का उल्लेख वन विभाग करता है।

11. आंध्र प्रदेश के पवित्र वन, जिन्हें कहा जाता है पवित्रवन

आंध्र प्रदेश में पवित्र वन क्षेत्रों को पवित्रवन नाम से जाना जाता है। भारत सरकार की रिपोर्ट में राज्य में ऐसे 580 क्षेत्रों का उल्लेख है।

इन स्थानों का संबंध स्थानीय देवी-देवताओं और धार्मिक मान्यताओं से रहा है। कई क्षेत्रों में वनस्पतियों को धार्मिक महत्व मिलने के कारण उनका संरक्षण किया जाता है।

यह उदाहरण बताता है कि पवित्र वन की परंपरा केवल पहाड़ी या आदिवासी क्षेत्रों तक सीमित नहीं रही, बल्कि दक्षिण भारत के मैदानी और ग्रामीण इलाकों में भी इसकी मजबूत परंपरा रही है।

12. अरुणाचल प्रदेश के गुम्पा वन, मठों के आसपास बची हरियाली

अरुणाचल प्रदेश में बौद्ध मठों से जुड़े पवित्र वन क्षेत्रों को गुम्पा फॉरेस्ट कहा जाता है।

भारत सरकार की पर्यावरण रिपोर्ट में अरुणाचल प्रदेश में ऐसे 101 पवित्र वन क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है।

इनका धार्मिक संबंध मठों और स्थानीय समुदायों से रहा है। जंगलों की रक्षा में धार्मिक विश्वास और स्थानीय नियमों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

13. मणिपुर के पवित्र वन, जहां जंगल देवता का घर

मणिपुर में पवित्र वनों को अलग-अलग स्थानीय नामों से जाना जाता है। इनमें गमखाप और उमंगलई जैसे नाम मिलते हैं।

भारत सरकार की रिपोर्ट में मणिपुर के ऐसे 166 पवित्र वन क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है।

इन वनों में स्थानीय देवताओं और प्रकृति पूजा से जुड़ी परंपराएं हैं। जंगलों को केवल संसाधन नहीं बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत माना जाता रहा है।

14. ओडिशा के जाहेरा, गांव के देवता का वन

ओडिशा में पवित्र वन क्षेत्रों को जाहेरा और ठाकुरम्मा जैसे नामों से जाना जाता है। पुराने अध्ययनों में राज्य के ऐसे सैकड़ों पवित्र वन क्षेत्रों का उल्लेख मिलता है।

आदिवासी समुदायों के धार्मिक जीवन में इन जंगलों का महत्वपूर्ण स्थान है। यहां पेड़-पौधों और प्राकृतिक स्थानों को स्थानीय देवी-देवताओं से जोड़ा जाता है।

यही विश्वास कई स्थानों पर जंगलों की कटाई को रोकने वाला सामाजिक नियम बन गया।

15. छत्तीसगढ़ की देवगुड़ी, जंगल में देवताओं का बसेरा

छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में देवगुड़ी परंपरा खास महत्व रखती है। ये स्थान अक्सर पेड़ों और वन क्षेत्र से घिरे होते हैं और स्थानीय देवताओं की पूजा का केंद्र होते हैं।

छत्तीसगढ़ सरकार के अनुसार राज्य में सैकड़ों देवगुड़ी वनसमृद्ध आदिवासी क्षेत्रों में स्थित हैं। इन्हें सांस्कृतिक विरासत और जैव विविधता से भी जोड़ा गया है।

इन स्थानों पर पेड़ों और जंगलों के प्रति सम्मान स्थानीय संस्कृति का हिस्सा है। इसलिए कई देवगुड़ी क्षेत्रों में वन को नुकसान पहुंचाने वाले काम सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं माने जाते।

आखिर क्यों बच गए ये जंगल?

इन पवित्र वनों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनका संरक्षण हमेशा केवल सरकारी नियमों पर निर्भर नहीं रहा। गांव के लोगों ने स्वयं कुछ नियम बनाए और पीढ़ी-दर-पीढ़ी उन्हें आगे बढ़ाया।

कहीं पेड़ काटने को देवता का अपराध माना गया, कहीं जंगल से लकड़ी निकालने पर सामाजिक रोक लगी और कहीं प्राकृतिक जल स्रोत को पवित्र मानकर उसके आसपास की हरियाली बचाई गई।

केरल वन विभाग के अध्ययन बताते हैं कि ऐसे पवित्र वन जैव विविधता, जल संरक्षण और स्थानीय पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण हैं।

जंगल छोटा है, लेकिन महत्व बहुत बड़ा

इनमें से कई पवित्र वन क्षेत्र आकार में बहुत छोटे हैं। फिर भी इनमें पुराने पेड़, औषधीय पौधे, पक्षी, कीट और दूसरे जीव सुरक्षित रह सकते हैं।

यही कारण है कि वैज्ञानिकों के लिए ये जंगल प्राकृतिक प्रयोगशाला जैसे हैं। एक छोटा पवित्र वन भी यह समझने में मदद कर सकता है कि बिना बड़े सरकारी संरक्षण तंत्र के कोई समुदाय स्थानीय जैव विविधता को कैसे बचा सकता है।

सबसे बड़ा रहस्य आस्था नहीं, संरक्षण की परंपरा है

इन जंगलों की कहानियों में देवता, चमत्कार और रहस्यमयी मान्यताएं जरूर मिलती हैं। लेकिन इनके पीछे एक सीधी बात भी दिखाई देती है—जिस प्रकृति को इंसान ने पवित्र माना, उसे उसने लंबे समय तक नुकसान से बचाया।

मेघालय में पेड़ काटने और वनस्पति तोड़ने पर धार्मिक रोक, राजस्थान में ओरान की सामुदायिक रक्षा, कर्नाटक के देवरकाडु में पेड़ों की सुरक्षा और केरल के कावू में जैव विविधता—ये सभी उदाहरण बताते हैं कि भारतीय समाज में प्रकृति संरक्षण की परंपरा बहुत पुरानी है।

आज जब जंगलों पर विकास और मानवीय दबाव बढ़ रहा है, तब ये पवित्र वन केवल धार्मिक आस्था के स्थल नहीं, बल्कि प्रकृति और समाज के पुराने रिश्ते की जीवित मिसाल भी हैं।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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