पट्टदकल – जहाँ पत्थरों में जीवंत होती है भारतीय वास्तुकला, राजाओं के राज्याभिषेक की यह भूमि है
मलप्रभा के किनारे चालुक्य राजाओं के राज्याभिषेक की धरती, जहाँ नागर और द्रविड़ शैलियाँ एक ही आँगन में खड़ी हैं

मलप्रभा नदी के तट पर बसा कर्नाटक का छोटा-सा गाँव ‘पट्टदकल’ (Pattadakal) भारतीय इतिहास और वास्तुकला प्रेमियों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं है। 7वीं और 8वीं शताब्दी के चालुक्य राजवंश के दौर का यह ऐतिहासिक स्थल इस बात का प्रमाण है कि हमारे प्राचीन शिल्पकारों की कल्पना और तकनीकी कौशल कितना उन्नत था। यहाँ उत्तर और दक्षिण भारत की मंदिर निर्माण शैलियाँ एक ही प्रांगण में साथ खड़ी दिखाई देती हैं, यही वजह है कि इसे ‘भारतीय मंदिर वास्तुकला की प्रयोगशाला’ कहा जाता है।
राज्याभिषेक की धरती: पट्टदकिसुवोलल
बागलकोट ज़िले में स्थित पट्टदकल का नाम कन्नड़ के ‘पट्टद कल्लु’ (राज्याभिषेक का पत्थर) से पड़ा है। बादामी के चालुक्य राजाओं के शासनकाल में इस पावन भूमि को राजाओं के राज्याभिषेक का आधिकारिक केंद्र माना जाता था। प्राचीन शिलालेखों में इसका नाम ‘पट्टदकिसुवोलल’ मिलता है। पास के ऐहोल और बादामी के साथ मिलकर यह क्षेत्र चालुक्य कला का एक अनूठा त्रिकोण बनाता है।
विरुपाक्ष मंदिर: परिसर का भव्य मुकुट
यहाँ का सबसे बड़ा और प्रमुख आकर्षण विरुपाक्ष मंदिर है। ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार, इसे चालुक्य राजा विक्रमादित्य द्वितीय की पटरानी लोकमहादेवी ने पल्लवों पर ऐतिहासिक विजय की स्मृति में बनवाया था। इसकी वास्तुकला पर कांचीपुरम के प्रसिद्ध कैलासनाथ मंदिर का गहरा प्रभाव दिखता है। मंदिर के खंभों और दीवारों पर रामायण और महाभारत के प्रसंग इतनी बारीकी से उकेरे गए हैं कि पूरा मंदिर परिसर एक खुली हुई प्राचीन पुस्तक जैसा प्रतीत होता है। इसके ठीक सामने विशाल नंदी मंडप स्थित है।
इसके पास ही स्थित मल्लिकार्जुन मंदिर को दूसरी रानी त्रैलोक्यमहादेवी से जोड़ा जाता है, जो यह दर्शाता है कि उस दौर में रानियाँ कला और मंदिर निर्माण की बड़ी संरक्षक हुआ करती थीं।
नागर और द्रविड़ शैलियों का अनूठा संगम
पट्टदकल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहाँ देश की दोनों प्रमुख मंदिर निर्माण शैलियाँ एक साथ देखने को मिलती हैं:
- द्रविड़ शैली: संगमेश्वर मंदिर और कुछ अन्य प्राचीन मंदिर दक्षिण भारतीय पिरामिडनुमा विमान शैली के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
- नागर शैली: जंबुलिंग, गलगनाथ, कडसिद्धेश्वर और काशीविश्वनाथ मंदिरों में उत्तर भारत की शिखर शैली की झलक मिलती है।
- मिश्रित शैली: पापनाथ मंदिर नागर और द्रविड़ दोनों शैलियों के सुंदर सम्मिश्रण का अनूठा नमूना है।
- परिसर से थोड़ी दूरी पर राष्ट्रकूट काल का जैन नारायण मंदिर भी स्थित है, जो यहाँ की धार्मिक सहिष्णुता और कलात्मक विविधता को दर्शाता है।
पत्थरों पर रची गई पौराणिक कथाएँ
यहाँ के लाल-गुलाबी बलुआ पत्थरों पर की गई नक्काशी सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि भारतीय सनातन संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है। सुबह और शाम की हल्की धूप जब इन पत्थरों पर पड़ती है, तो उकेरी गई आकृतियाँ और अधिक उभरकर सामने आती हैं। इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए 1987 में यूनेस्को (UNESCO) ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। आज भी यहाँ पारंपरिक उत्सवों और प्रसिद्ध पट्टदकल नृत्योत्सव के जरिए यह प्राचीन विरासत पूरी शान से जीवित है।



