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भारत का पहला संग्रहालय: कोलकाता की इस ऐतिहासिक इमारत में छिपा है हजारों साल पुराना खजाना, मिस्र की ममी से लेकर प्राचीन मूर्तियों तक का अनोखा संसार

1814 में हुई थी भारतीय संग्रहालय की स्थापना। यहां प्राचीन सभ्यताओं की निशानियां, बौद्ध काल की कलाकृतियां, दुर्लभ सिक्के, जीवाश्म और मिस्र की ममी देखने को मिलती है। जानिए कैसे शुरू हुआ भारत के पहले संग्रहालय का सफर।

कल्पना कीजिए कि आप एक ऐसी इमारत में प्रवेश करते हैं, जहां एक ओर हजारों साल पुरानी मूर्तियां आपका स्वागत करती हैं, दूसरी ओर प्राचीन सिक्के बीते राजवंशों की कहानी सुनाते हैं। कहीं पत्थरों पर उकेरी गई कलाकृतियां हैं, तो कहीं ऐसे जीवों के जीवाश्म मौजूद हैं, जो धरती पर लाखों साल पहले रहा करते थे। इसी इमारत में मिस्र की प्राचीन ममी भी रखी है, जिसे देखकर लोग आज भी हैरान रह जाते हैं।

यह कोई काल्पनिक जगह नहीं, बल्कि कोलकाता में स्थित भारत का पहला संग्रहालय है। इसे इंडियन म्यूजियम के नाम से जाना जाता है। इसकी स्थापना 2 फरवरी 1814 को हुई थी। यह भारत के सबसे पुराने और महत्वपूर्ण संग्रहालयों में शामिल है। यहां रखी वस्तुएं केवल देखने भर के लिए नहीं हैं, बल्कि इनके माध्यम से भारत और दुनिया के इतिहास की अनेक कहानियां सामने आती हैं।

इस संग्रहालय की सबसे खास बात यह है कि यहां कला, पुरातत्व, प्राकृतिक इतिहास और विज्ञान से जुड़ी वस्तुएं एक ही परिसर में देखने को मिलती हैं। यही वजह है कि इतिहास के विद्यार्थियों से लेकर पर्यटकों और शोधकर्ताओं तक के लिए यह स्थान विशेष महत्व रखता है।

कैसे हुई भारत के पहले संग्रहालय की शुरुआत?

भारत में संग्रहालय बनाने का विचार उस समय सामने आया, जब कोलकाता अंग्रेजी शासन के दौरान अध्ययन और शोध के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित हो रहा था।

वर्ष 1784 में कोलकाता में एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य एशिया के इतिहास, भाषा, संस्कृति, साहित्य, कला और प्राकृतिक संपदा का अध्ययन करना था। इसके सदस्यों ने धीरे-धीरे दुर्लभ वस्तुओं, पुरानी मूर्तियों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और प्राकृतिक नमूनों को इकट्ठा करना शुरू किया।

इन वस्तुओं को सुरक्षित रखने और लोगों के सामने प्रदर्शित करने के लिए एक संग्रहालय की जरूरत महसूस हुई। इसी दिशा में डेनमार्क में जन्मे वनस्पति वैज्ञानिक डॉ. नाथेनियल वालिच ने महत्वपूर्ण पहल की। उन्होंने संग्रहालय स्थापित करने का प्रस्ताव दिया और अपने संग्रह की वस्तुएं भी उपलब्ध कराने की पेशकश की।

आखिरकार, 2 फरवरी 1814 को एशियाटिक सोसाइटी के परिसर में संग्रहालय की स्थापना हुई। शुरुआत में इसका संग्रह सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे इसमें ऐतिहासिक, पुरातात्विक और प्राकृतिक वस्तुएं जुड़ती गईं।

बाद में संग्रहालय के लिए अलग इमारत बनाई गई। वर्तमान भवन का निर्माण 19वीं सदी में हुआ और 1878 में इसे आम लोगों के लिए खोल दिया गया।

इस तरह एक छोटे संग्रह से शुरू हुई यात्रा भारत के सबसे महत्वपूर्ण संग्रहालयों में से एक के रूप में विकसित हुई।

मिस्र की ममी: संग्रहालय का सबसे चर्चित आकर्षण

कोलकाता के भारतीय संग्रहालय की चर्चा होते ही जिस वस्तु का नाम सबसे पहले लिया जाता है, वह है मिस्र की प्राचीन ममी।

ममी को देखकर अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि हजारों साल पहले किसी मृत व्यक्ति के शरीर को इतने लंबे समय तक सुरक्षित कैसे रखा जाता था। प्राचीन मिस्र में शवों को सुरक्षित रखने की विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती थी। इसका संबंध वहां की धार्मिक मान्यताओं और मृत्यु के बाद जीवन की अवधारणा से था।

ममी बनाने की प्रक्रिया में शरीर से नमी निकालने और उसे लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए विभिन्न पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता था। इसके बाद शरीर को कपड़ों की पट्टियों से लपेटा जाता था। यह काम विशेष ज्ञान और परंपराओं के आधार पर किया जाता था।

भारतीय संग्रहालय में प्रदर्शित ममी इसी प्राचीन मिस्री परंपरा की झलक दिखाती है। इसे देखने पर पता चलता है कि प्राचीन सभ्यताओं में मृत्यु, शरीर और परलोक को लेकर कितनी गहरी मान्यताएं थीं।

यह ममी संग्रहालय आने वाले लोगों के लिए खास आकर्षण है, क्योंकि भारत में रहते हुए किसी प्राचीन मिस्री सभ्यता से जुड़ी ऐसी वस्तु को करीब से देखने का अवसर मिलता है।

भरहुत स्तूप की कलाकृतियां सुनाती हैं बौद्ध धर्म की कहानी

भारतीय संग्रहालय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा प्राचीन बौद्ध कला से जुड़ा है। यहां मध्य प्रदेश के भरहुत स्तूप से प्राप्त कई कलाकृतियां संरक्षित हैं।

भरहुत स्तूप प्राचीन भारत के बौद्ध धार्मिक स्थलों में महत्वपूर्ण स्थान रखता था। यहां से प्राप्त पत्थर की रेलिंग, सजावटी पट्टिकाएं और दूसरी कलाकृतियां प्राचीन भारतीय शिल्पकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

इन कलाकृतियों पर धार्मिक कथाओं, पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों और उस समय के जीवन से जुड़ी आकृतियां उकेरी गई हैं। इनमें बुद्ध के जीवन और बौद्ध परंपरा से संबंधित प्रसंग भी देखने को मिलते हैं।

इनकी खासियत यह है कि प्राचीन कलाकारों ने पत्थर जैसे कठोर माध्यम पर बेहद बारीक काम किया था। आकृतियों के भाव, वस्त्रों की बनावट और सजावट में उनकी कलात्मक समझ साफ दिखाई देती है।

आज ये कलाकृतियां केवल धार्मिक इतिहास की जानकारी नहीं देतीं, बल्कि यह भी बताती हैं कि प्राचीन भारत में कला और स्थापत्य कितने विकसित थे।

गांधार कला: भारतीय और विदेशी शैलियों का अनोखा मेल

संग्रहालय में प्राचीन मूर्तियों का संग्रह भी विशेष महत्व रखता है। इनमें गांधार कला से जुड़ी प्रतिमाएं उल्लेखनीय हैं।

गांधार कला का विकास प्राचीन उत्तर-पश्चिमी भारतीय उपमहाद्वीप के उस क्षेत्र में हुआ, जो आज मुख्य रूप से पाकिस्तान और अफगानिस्तान के हिस्सों से जुड़ा है। इस कला शैली में भारतीय धार्मिक परंपराओं के साथ यूनानी और रोमन कला के प्रभाव भी दिखाई देते हैं।

बुद्ध की कुछ प्रतिमाओं में लहराते वस्त्र, घुंघराले बाल और चेहरे की ऐसी बनावट देखने को मिलती है, जिनमें विदेशी शिल्प परंपराओं की झलक मिलती है।

इन मूर्तियों को देखकर समझ आता है कि प्राचीन समय में विभिन्न क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक संपर्क किस तरह कला को प्रभावित करता था। व्यापार, यात्राओं और राजनीतिक संबंधों के कारण अलग-अलग संस्कृतियों की शैलियां एक-दूसरे से मिलती रहीं।

इसलिए गांधार कला केवल मूर्तियों का संग्रह नहीं, बल्कि प्राचीन दुनिया के सांस्कृतिक आदान-प्रदान की कहानी भी है।

पुराने सिक्कों में छिपा है राजाओं और व्यापार का इतिहास

भारतीय संग्रहालय में सिक्कों का संग्रह भी बेहद महत्वपूर्ण है। संग्रहालय की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, यहां दक्षिण एशिया के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े 50 हजार से अधिक सिक्कों का संग्रह है।

आज के दौर में सिक्के लेन-देन का साधन हैं, लेकिन पुराने समय में उनका महत्व इससे कहीं अधिक था। सिक्कों पर शासकों के नाम, प्रतीक, धार्मिक चिह्न और कभी-कभी लेख भी मिलते हैं। इनके अध्ययन से इतिहासकारों को पुराने राजवंशों और उनकी आर्थिक व्यवस्था के बारे में जानकारी मिलती है।

सिक्कों के आकार, धातु और उन पर बने निशानों से यह समझने में मदद मिलती है कि अलग-अलग कालखंडों में मुद्रा व्यवस्था कैसी थी। इसके अलावा व्यापारिक संपर्कों और शासकों के प्रभाव क्षेत्र का अध्ययन करने में भी सिक्के महत्वपूर्ण प्रमाण साबित होते हैं।

इस तरह संग्रहालय में रखे पुराने सिक्के केवल धातु के छोटे टुकड़े नहीं हैं, बल्कि वे इतिहास के ऐसे दस्तावेज हैं, जो कई बार लिखित स्रोतों से अलग जानकारी भी देते हैं।

जीवाश्म और प्राकृतिक इतिहास की अनोखी दुनिया

भारतीय संग्रहालय की खासियत यह है कि यहां केवल राजाओं, युद्धों और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी वस्तुएं नहीं रखी गई हैं। प्राकृतिक इतिहास से संबंधित संग्रह भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।

यहां जीवाश्म, खनिज, चट्टानें और प्राचीन जीव-जंतुओं से जुड़े नमूने देखने को मिलते हैं। इनके माध्यम से धरती के विकास और जीवन की लंबी यात्रा को समझने का अवसर मिलता है।

जीवाश्म उन जीवों या पौधों के अवशेष अथवा निशान होते हैं, जो बहुत लंबे समय तक प्राकृतिक प्रक्रियाओं के कारण सुरक्षित रह जाते हैं। इनसे वैज्ञानिकों को पता चलता है कि पुराने समय में धरती पर किस तरह के जीव रहते थे और पर्यावरण में किस प्रकार बदलाव आए।

खनिजों और चट्टानों का संग्रह पृथ्वी की बनावट और उसकी प्राकृतिक संपदा के बारे में जानकारी देता है। वहीं वनस्पति और प्राणी विज्ञान से जुड़े नमूने प्रकृति की विविधता को समझने में मदद करते हैं।

इस तरह यह संग्रहालय इतिहास और विज्ञान को एक साथ जोड़ता है। यहां आने वाले बच्चों और विद्यार्थियों के लिए यह एक ऐसी जगह है, जहां किताबों में पढ़ी बातें वास्तविक वस्तुओं के माध्यम से समझी जा सकती हैं।

चित्रकला और सजावटी वस्तुओं में दिखती है भारत की सांस्कृतिक विविधता

भारतीय संग्रहालय में चित्रकला, पारंपरिक कलाओं और सजावटी वस्तुओं से जुड़े संग्रह भी हैं। इनमें भारतीय लघुचित्र, बंगाल स्कूल की चित्रकला और विभिन्न प्रकार की कलात्मक वस्तुएं शामिल हैं।

भारत में चित्रकला की परंपरा अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूपों में विकसित हुई। कहीं धार्मिक कथाओं को चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया, तो कहीं राजदरबार, प्रकृति, सामाजिक जीवन और लोक परंपराओं को विषय बनाया गया।

पुराने चित्रों को देखने पर उस दौर के पहनावे, आभूषणों, भवनों और जीवनशैली के बारे में भी जानकारी मिलती है। इसी तरह हाथीदांत की कलाकृतियों, वस्त्रों और सजावटी वस्तुओं से उस समय के शिल्पकारों की कुशलता का पता चलता है।

ये वस्तुएं बताती हैं कि भारतीय कला केवल मंदिरों और महलों तक सीमित नहीं थी। रोजमर्रा के उपयोग की चीजों में भी कलात्मकता और सौंदर्यबोध दिखाई देता था।

छह विभागों में समेटी गई है ज्ञान की दुनिया

भारतीय संग्रहालय का संग्रह इतना व्यापक है कि इसे अलग-अलग विषयों के आधार पर व्यवस्थित किया गया है। इसकी प्रमुख शाखाओं में कला, पुरातत्व, मानव विज्ञान, प्राणी विज्ञान, भूविज्ञान और वनस्पति विज्ञान शामिल हैं।

पुरातत्व विभाग प्राचीन सभ्यताओं और ऐतिहासिक वस्तुओं से परिचित कराता है। कला विभाग मूर्तियों और कलाकृतियों की दुनिया सामने रखता है। मानव विज्ञान से जुड़े संग्रह मनुष्य के विकास और विभिन्न समुदायों की जीवनशैली को समझने में मदद करते हैं।

प्राणी विज्ञान, भूविज्ञान और वनस्पति विज्ञान से जुड़े संग्रह प्राकृतिक दुनिया की जानकारी देते हैं। इस तरह संग्रहालय में इतिहास के साथ-साथ वैज्ञानिक अध्ययन की भी व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं।

यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। एक ही जगह पर आने वाला व्यक्ति प्राचीन सभ्यताओं से लेकर प्राकृतिक इतिहास तक अनेक विषयों के बारे में जान सकता है।

पर्यटकों और विद्यार्थियों के लिए क्यों है खास?

भारतीय संग्रहालय उन लोगों के लिए खास है, जो इतिहास को केवल किताबों में पढ़ने के बजाय वास्तविक वस्तुओं के माध्यम से समझना चाहते हैं।

यहां प्राचीन मूर्तियों को देखकर कला के विकास को समझा जा सकता है। पुराने सिक्के आर्थिक इतिहास से परिचित कराते हैं। जीवाश्म पृथ्वी के अतीत की जानकारी देते हैं, जबकि मिस्र की ममी दुनिया की दूसरी प्राचीन सभ्यताओं से परिचय कराती है।

विद्यार्थियों के लिए यह स्थान इतिहास, पुरातत्व, भूविज्ञान और जीव विज्ञान जैसे विषयों को करीब से समझने का अवसर है। वहीं पर्यटक यहां भारत की सांस्कृतिक विरासत के साथ दूसरे देशों के इतिहास की झलक भी देख सकते हैं।

संग्रहालय में संरक्षित वस्तुओं का अध्ययन और संरक्षण भी महत्वपूर्ण है। इन वस्तुओं को सुरक्षित रखना इसलिए जरूरी है, क्योंकि समय के साथ पुरानी सामग्री नष्ट हो सकती है। उचित देखभाल और वैज्ञानिक संरक्षण के जरिए इन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जाता है।

कहां स्थित है भारत का पहला संग्रहालय?

भारतीय संग्रहालय पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में जवाहरलाल नेहरू रोड पर स्थित है। यह शहर के प्रमुख ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों में शामिल है।

संग्रहालय घूमने जाने से पहले इसकी आधिकारिक वेबसाइट पर खुलने का समय, टिकट और उपलब्ध दीर्घाओं की जानकारी देख लेना बेहतर है। अलग-अलग समय पर मरम्मत या अन्य कारणों से कुछ हिस्सों में बदलाव हो सकता है।

अगर आप कोलकाता की यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो इस संग्रहालय को अपनी सूची में शामिल कर सकते हैं। यहां घूमने के लिए पर्याप्त समय रखना चाहिए, क्योंकि अलग-अलग दीर्घाओं में प्रदर्शित वस्तुओं को ध्यान से देखने में कई घंटे लग सकते हैं।

इतिहास को सहेजने की 200 साल से अधिक पुरानी परंपरा

1814 में शुरू हुआ भारतीय संग्रहालय आज भी भारत की सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विरासत को सहेजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यहां रखी हर प्राचीन मूर्ति, सिक्का, कलाकृति और जीवाश्म अतीत की किसी न किसी कहानी से जुड़ा है।

मिस्र की ममी प्राचीन दुनिया की शव-संरक्षण परंपरा की झलक दिखाती है। भरहुत की कलाकृतियां बौद्ध कला का महत्व बताती हैं। गांधार की मूर्तियां सांस्कृतिक संपर्कों की कहानी कहती हैं, जबकि सिक्के और जीवाश्म इतिहास तथा विज्ञान के अलग-अलग पहलुओं को सामने लाते हैं।

इस संग्रहालय की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने दुर्लभ वस्तुओं को सुरक्षित रखने के साथ-साथ लोगों के लिए ज्ञान का एक बड़ा केंद्र विकसित किया। यही वजह है कि कोलकाता का भारतीय संग्रहालय केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि भारत और दुनिया के अतीत को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम है।


जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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