लाल किले पर फहराने से पहले कई बार बदला रूप: जानिए तिरंगे के बनने की पूरी कहानी और इससे जुड़े विवाद

पिंगली वेंकैया के डिज़ाइन से लेकर संविधान सभा द्वारा अपनाए जाने तक, जानिए भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का विकासक्रम और उससे जुड़े ऐतिहासिक विवाद
हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को जब नीले आसमान में भारत का राष्ट्रीय ध्वज ‘तिरंगा’ फहराया जाता है, तो देश का हर नागरिक गर्व से भर उठता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज जिस स्वरूप में हम अपने राष्ट्रीय ध्वज को देखते हैं, यह रातों-रात बनकर तैयार नहीं हुआ था?
भारत का राष्ट्रीय ध्वज अपने वर्तमान रूप तक पहुँचने में दशकों लंबे संघर्ष, कई राजनीतिक बदलावों और वैचारिक सुधारों से गुजरा है। आंध्र प्रदेश के महान स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वेंकैया (Pingali Venkayya) द्वारा डिज़ाइन किए गए इस ध्वज का न केवल एक गौरवशाली इतिहास है, बल्कि इसके सफर में कई कड़वे विवाद भी जुड़े रहे हैं।
आइए, समझते हैं भारत के राष्ट्रीय ध्वज का पूरा सफरनामा और इससे जुड़ी हर छोटी-बड़ी ऐतिहासिक घटना।
1906 से 1947: कैसे बदलता गया भारत का राष्ट्रीय ध्वज?
पहला अनौपचारिक ध्वज (कोलकाता) सात अगस्त 1906
भारत का पहला अनौपचारिक ध्वज कोलकाता (तब कलकत्ता) के पारसी बागान चौक पर फहराया गया था। इसमें हरी, पीली और लाल रंग की तीन क्षैतिज पट्टियां थीं। ऊपर ‘वंदे मातरम्’ लिखा था और कमल के फूल तथा सूरज-चाँद के प्रतीक बने थे।
मैडम कामा का ‘पेरिस ध्वज’ 1907

मैडम भीकाजी कामा और उनके साथी क्रांतिकारियों ने जर्मनी के स्टटगार्ट में तिरंगा फहराया। इसमें पहले ध्वज की तुलना में रंगों में बदलाव किया गया था और सप्तऋषि को दर्शाने वाले सात तारे जोड़े गए थे।
होम रूल आंदोलन का ध्वज 1917

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और डॉ. एनी बेसेंट ने ‘होम रूल आंदोलन’ के दौरान एक नया झंडा फहराया। इसमें 5 लाल और 4 हरी पट्टियां थीं, जिसके ऊपरी कोने पर ब्रिटिश ‘यूनियन जैक’ भी लगा हुआ था।
पिंगली वेंकैया का डिज़ाइन (मूल तिरंगा) 1921
विजयवाड़ा में कांग्रेस कमेटी के सत्र में पिंगली वेंकैया ने महात्मा गांधी को एक झंडा प्रस्तुत किया। इसमें मूल रूप से लाल (हिंदू) और हरा (मुस्लिम) रंग था। गांधीजी के सुझाव पर अन्य समुदायों और शांति के प्रतीक के तौर पर सफेद पट्टी और स्वावलंबन के लिए चरखा जोड़ा गया।
आधिकारिक तिरंगे को मंज़ूरी 1931

कराची सत्र में कांग्रेस ने तिरंगे को आधिकारिक ध्वज के रूप में स्वीकार किया। यहाँ रंगों को धार्मिक संदर्भों से अलग कर नया राष्ट्रीय अर्थ दिया गया:
- केसरिया: साहस और त्याग
- सफेद: सत्य और शांति
- हरा: विश्वास और समृद्धि
सफेद पट्टी के बीच चरखा बना रहा।
वर्तमान राष्ट्रीय ध्वज का अंगीकरण 22 जुलाई 1947
स्वतंत्रता से ठीक पहले डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता वाली संविधान सभा ने वर्तमान तिरंगे को स्वतंत्र भारत का राष्ट्रीय ध्वज माना। इसमें एकमात्र बड़ा बदलाव चरखे के स्थान पर अशोक स्तंभ का नीले रंग का ’24 तीलियों वाला चक्र’ शामिल करना था।
राष्ट्रीय ध्वज के मुख्य नियम और मानक
राष्ट्रीय ध्वज का निर्माण और प्रदर्शन एक तय मानक के अनुसार ही होता है:
- अनुपात: ध्वज की लंबाई और चौड़ाई का अनुपात हमेशा $3 : 2$ होना चाहिए।
- रंग क्रम: सबसे ऊपर केसरिया, मध्य में सफेद और सबसे नीचे हरा रंग।
- अशोक चक्र: सफेद पट्टी के ठीक केंद्र में गहरे नीले (Navy Blue) रंग का 24 तीलियों वाला चक्र, जो देश की निरंतर प्रगति और धर्म/न्याय का प्रतीक है।
जब तिरंगे का हुआ विरोध: इतिहास के चर्चित विवाद
तिरंगे ने जहाँ करोड़ों भारतीयों को एकसूत्र में बाँधा, वहीं देश के इतिहास में अलग-अलग समय पर विभिन्न विचारधाराओं और उग्रवादी समूहों द्वारा इसका विरोध या बहिष्कार भी देखने को मिला:
1. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) और 52 साल का विवाद
स्वतंत्रता के बाद लगभग 52 वर्षों तक (1950 से 2002) नागपुर स्थित संघ मुख्यालय पर नियमित तिरंगा न फहराए जाने को लेकर विवाद रहा।
- वैचारिक आधार: संघ के शुरुआती विचारकों (जैसे एम.एस. गोलवलकर) का मानना था कि भारत का सांस्कृतिक ध्वज ‘भगवा’ होना चाहिए। 1947 में संघ के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइज़र’ में तीन रंगों वाले ध्वज को लेकर नकारात्मक टिप्पणी भी छपी थी।
- संघ का पक्ष: आरएसएस का स्पष्टीकरण रहा कि 2002 से पहले लागू ‘भारतीय ध्वज संहिता’ (Flag Code of India) के सख्त नियमों के कारण आम नागरिकों या निजी संगठनों को रोज़मर्रा के आधार पर अपने कार्यालयों पर तिरंगा फहराने की अनुमति नहीं थी। 26 जनवरी 2002 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश और संहिता में संशोधन के बाद से संघ मुख्यालय पर तिरंगा फहराया जाने लगा।
2. वामपंथी दलों का रुख (1947–1950 का दशक)
स्वतंत्रता के तुरंत बाद, अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के एक धड़े ने 1947 की आजादी को “पूंजीपतियों और अंग्रेजों के बीच का समझौता” बताते हुए “ये आजादी झूठी है” का नारा दिया और तिरंगे के बजाय लाल झंडे को तरजीह दी। बाद में वे लोकतांत्रिक मुख्यधारा में शामिल हुए और राष्ट्रध्वज को अपनाया।
3. जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी समूह
ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस और घाटी के अलगाववादी संगठन दशकों तक 15 अगस्त और 26 जनवरी को ‘काला दिवस’ के रूप में मनाते रहे और तिरंगे को फहराने का बहिष्कार करते रहे। (2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद इस स्थिति में बड़ा बदलाव आया है)।
4. पूर्वोत्तर के उग्रवादी संगठन (ULFA, NSCN)
असम के उल्फा और नागालैंड के एनएससीएन जैसे संगठनों ने संप्रभुता की मांग को लेकर वर्षों तक राष्ट्रीय पर्वों पर तिरंगा फहराने का बहिष्कार किया और आम जनता को धमकियाँ दीं।
5. खालिस्तानी पृथकतावादी और लाल किला विवाद (2021)
पंजाब में उग्रवाद के दौर से लेकर विदेशों में सक्रिय ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ जैसे संगठन तिरंगे का विरोध करते रहे हैं। इसका सबसे चर्चित उदाहरण 26 जनवरी 2021 को दिखा, जब किसान आंदोलन के दौरान उपद्रवियों के एक गुट ने दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज के स्तंभ के पास अपना धार्मिक ध्वज ‘निशान साहिब’ फहरा दिया था, जिससे देशभर में भारी आक्रोश फैला था।





