अल्मोड़ा की बाल मिठाई और सिंगोरी: पहाड़ का वह स्वाद, जो गढ़वाल और कुमाऊँ को जोड़ता है
खोये की भुनी महक और मालू के पत्ते की ख़ुशबू, उत्तराखंड की दो पारंपरिक मिठाइयों की कहानी

पहाड़ की किसी दुकान के काँच में गहरे भूरे रंग की चौकोर बर्फ़ियाँ सजी हों, जिन पर सफ़ेद दाने जड़े हों, तो समझ लीजिए आप अल्मोड़ा में हैं। यह बाल मिठाई है। इसके बग़ल में हरे पत्ते में लिपटा एक नुकीला शंकु रखा हो, तो वह सिंगोरी है। कुमाऊँ की ये दो मिठाइयाँ स्वाद के साथ-साथ इतिहास और रिश्तों की कहानी भी कहती हैं।
चॉकलेट जैसी दिखने वाली बाल मिठाई
बाल मिठाई भुने हुए खोये से बनी भूरी, चॉकलेट जैसी बर्फ़ी है, जिस पर भुनी हुई खसखस के चीनी-चढ़े सफ़ेद दाने लगाए जाते हैं। इसे बनाने में खोये को गन्ने की चीनी के साथ तब तक पकाया जाता है जब तक वह गहरा भूरा न हो जाए। फिर उसे ठंडा कर चौकोर टुकड़ों में काटकर दानों में लपेटा जाता है। रंग की वजह से इसे बोलचाल में “चॉकलेट” भी कहा जाता है।
इस मिठाई की जड़ें अल्मोड़ा के लाल बाज़ार में बताई जाती हैं। माना जाता है कि बीसवीं सदी की शुरुआत में स्थानीय लोगों ने इसे गढ़ा, और 1865 से लाल बाज़ार में कारोबार कर रहे हलवाई जोगा लाल साह को आज की बाल मिठाई का श्रेय दिया जाता है। उनकी दुकान आज भी उनके वंशज चलाते हैं।
इसे घर-घर पहुँचाने में एक और नाम की बड़ी भूमिका रही। जोगा लाल साह की दुकान में काम करने वाले भाई खीम सिंह और मोहन सिंह रौतेला ने केमू (KMOU) बस अड्डे के पास अपनी दुकान खोली, और बस यात्रियों के बीच उनकी मिठाई ख़ूब लोकप्रिय हुई। स्थानीय अध्येता भी मानते हैं कि जोगा साह का नाम भले ज़्यादा चर्चित हो, पर इसे मशहूर करने में खीम सिंह-मोहन सिंह रौतेला की भूमिका भी कम नहीं थी, और सैलानी इनकी “चॉकलेट” और सिंगोड़ी दूर-दूर तक ले गए।
दूध की महक का राज़
अल्मोड़ा की बाल मिठाई का असली आधार इसका खोया है। यह खोया जागेश्वर, शीतलाखेत, लाट, चौँसली और रानीखेत के आसपास के गाँवों में स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाले गाय-भैंस के दूध से बनता है, जो रोज़गार का भी बड़ा स्रोत है। एक अध्ययन-लेख के अनुसार स्थानीय घास-चारे के गुणों से दूध में आने वाली महक खोये को विशिष्ट बना देती है, और एक समय अल्मोड़ा में रोज़ाना करीब 100 क्विंटल मावे की मिठाइयाँ बनती थीं।
मालू के पत्ते में लिपटी सिंगोरी

दूसरी मिठाई सिंगोरी (सिंगौड़ी) है। यह मीठे खोये से बनती है, छोटे शंकु का आकार दिया जाता है और ख़ुशबूदार मालू (बौहिनिया वैरिएगाटा) के पत्ते में लपेटा जाता है। पत्ता मिठाई को आकार देने के साथ उसे अलग महक और स्वाद भी देता है। स्वाद और बनावट में इसकी तुलना कलाकंद से की जाती है। आम तौर पर इसमें खोया, चीनी और इलायची पड़ती है, और इसे ठंडा करके परोसने पर असली स्वाद आता है।
किसकी है सिंगोरी: कुमाऊँ की या गढ़वाल की?
इस सवाल का एक जवाब नहीं है। साहित्यिक और ऐतिहासिक वृत्तांतों में टिहरी गढ़वाल से इसका पुराना रिश्ता दर्ज है। “मेरी टिहरी” में इसे टिहरी की प्रसिद्ध मिठाई बताया गया है, जिसे मैदानों में “पत्ते वाली मिठाई” कहा जाता था। दूसरी ओर आज यह अल्मोड़ा और कुमाऊँ से ज़्यादा पहचानी जाती है।
अल्मोड़ा के लाला बाज़ार की एक पाँचवीं पीढ़ी की दुकान का क़िस्सा इस रिश्ते को बयान करता है। दुकानदार के मुताबिक़ उनके पूर्वज बद्रीनाथ यात्रा पर गए तो गढ़वाल में मालू के पत्तों में लिपटी मावे की मिठाई देखी, और उसी से कुमाऊँ में सिंगौड़ी बनने की शुरुआत हुई। यह दुकानदार की अपनी पारिवारिक मान्यता है। इसी लेख में कहा गया है कि मिठाई ने गढ़वाल-कुमाऊँ के पुराने राजनीतिक मनमुटाव की कड़वाहट घटाने में भूमिका निभाई। लेख के अनुसार श्रीनगर और टिहरी की मशहूर सिंगोरी अब इतिहास बनकर रह गई है।
पहचान और संरक्षण की चुनौती
2007 में गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के बुलेटिन में बाल मिठाई और सिंगोरी के लिए GI संरक्षण पर जागरूकता शिविर का ज़िक्र मिलता है। इसका मक़सद स्थानीय मिठाई निर्माताओं को बौद्धिक संपदा अधिकारों की जानकारी देना था। आज भी अल्मोड़ा की दुकानों में यह मिठाई “अल्मोड़ा की प्रसिद्ध बाल मिठाई” के नाम से ही बिकती है। कारीगरों की नई पीढ़ी, दूध-खोये की उपलब्धता और बदलता बाज़ार, ये सब इस विरासत के सामने सवाल हैं।



