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भारत की ऐसी डिश, जिन्हें देखकर विदेशी भी रह जाते हैं हैरान

लाल चींटी की चटनी से रेशम के कीड़े तक, कहीं बांस में पकता है खाना तो कहीं लहसुन से बनती है खीर; भारतीय खानपान की ये 15 परंपराएं पहली नजर में चौंकाती जरूर हैं, लेकिन इनके पीछे छिपी है सदियों पुरानी संस्कृति

भारत को अगर दुनिया के सबसे बड़े स्वाद-नक्शे में रखा जाए तो शायद कोई भी नक्शा इसकी पूरी तस्वीर नहीं बता पाएगा। कश्मीर की वाजवान परंपरा से लेकर केरल की मसालेदार करी तक और राजस्थान के सूखे व्यंजनों से लेकर पूर्वोत्तर के किण्वित भोजन तक—हर कुछ सौ किलोमीटर पर स्वाद बदल जाता है।

भारतीय खानपान की यही विविधता विदेशी यात्रियों को सबसे ज्यादा आकर्षित करती है। लेकिन भारत में कुछ ऐसे व्यंजन भी हैं, जिनकी सामग्री या बनाने का तरीका पहली बार देखने वाले को चौंका देता है। लाल चींटियों से बनी चटनी, रेशम के कीड़े का प्यूपा, मेंढक की टांग, किण्वित आलू और यहां तक कि लहसुन से बनी मिठाई—ये सब भारतीय खानपान की वास्तविक परंपराओं का हिस्सा हैं।

आइए जानते हैं देश के अलग-अलग हिस्सों के ऐसे ही स्वादों के बारे में।

1. चापड़ा चटनी—जब लाल चींटी बन जाती है स्वाद का राज

छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में लोकप्रिय चापड़ा चटनी शायद इस सूची का सबसे चौंकाने वाला नाम है। इसे लाल बुनकर चींटियों और उनके अंडों से तैयार किया जाता है। इसमें नमक, मिर्च, अदरक और लहसुन जैसे मसाले मिलाए जाते हैं।

पहली बार सुनने वाले के लिए यह भले ही असामान्य लगे, लेकिन स्थानीय आदिवासी समुदायों के लिए यह लंबे समय से खानपान का हिस्सा रही है। पूर्वी भारत के कई हिस्सों में लाल चींटी से जुड़ी ऐसी चटनियां मिलती हैं। ओडिशा की ‘काई चटनी’ को जीआई टैग भी मिल चुका है।

2. एरी पोलू—रेशम से निकलकर प्लेट तक पहुंचता स्वाद

असम में रेशम उत्पादन की परंपरा सिर्फ कपड़े तक सीमित नहीं है। यहां एरी पोलू नामक व्यंजन रेशम के कीड़े के प्यूपा से तैयार किया जाता है।

रेशम निकालने के बाद बचे प्यूपा को स्थानीय मसालों और जड़ी-बूटियों के साथ पकाया जाता है। कुछ विदेशी पर्यटकों के लिए इसका नाम ही आश्चर्य पैदा कर देता है, लेकिन असम की कुछ पारंपरिक खाद्य संस्कृतियों में यह जाना-पहचाना भोजन है।

3. सिक्किम की मेंढक की टांग—पहाड़ों का अलग स्वाद

सिक्किम के लेपचा समुदाय से जुड़ी खाद्य परंपराओं में मेंढक की टांग भी मिलती है। इसे विभिन्न तरीकों से पकाया जाता है।

विदेशी पर्यटक ही नहीं, भारत के दूसरे हिस्सों से आने वाले लोगों को भी यह व्यंजन पहली बार देखकर आश्चर्य हो सकता है। इसकी खासियत सिर्फ सामग्री नहीं बल्कि यह भी है कि पहाड़ी समुदायों ने अपने आसपास उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर अपनी खाद्य परंपराएं विकसित कीं।

4. फान प्युट—आलू को सड़ाकर भी बनाया जाता है खाना!

आलू को आमतौर पर ताजा सब्जी के रूप में खाया जाता है, लेकिन पूर्वोत्तर भारत की कुछ पारंपरिक खाद्य परंपराओं में फान प्युट नामक व्यंजन के लिए आलू को लंबे समय तक रखा और किण्वित किया जाता है।

इसकी गंध और स्वाद पहली बार खाने वाले को अलग लग सकता है, लेकिन किण्वन भारतीय और खासकर पूर्वोत्तर खाद्य संस्कृति की महत्वपूर्ण तकनीक है। किण्वित भोजन को लंबे समय तक सुरक्षित रखने और अलग स्वाद पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है।

5. गोवा की बेबी शार्क करी

गोवा का नाम सुनते ही ज्यादातर लोगों को समुद्री भोजन याद आता है। लेकिन यहां की कुछ पारंपरिक समुद्री खाद्य परंपराएं पर्यटकों को चौंका सकती हैं।

बेबी शार्क करी, जिसे कुछ जगहों पर ‘मोरी मटन’ के नाम से भी जाना जाता है, छोटी शार्क से तैयार की जाने वाली क्षेत्रीय डिश के रूप में जानी जाती है।

यहां समुद्र सिर्फ पर्यटन का हिस्सा नहीं बल्कि सदियों से स्थानीय खानपान और आजीविका का भी आधार रहा है।

6. भेजा फ्राई—दिमाग से तैयार होती है खास डिश

भारत के कई शहरों में भेजा फ्राई लंबे समय से लोकप्रिय मांसाहारी व्यंजनों में शामिल है। इसे आम तौर पर बकरे या भेड़ के दिमाग से बनाया जाता है।

हैदराबाद और लखनऊ जैसे शहरों की खाद्य संस्कृति में इसके अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं। पहली बार सुनने वाले विदेशी पर्यटक को यह जरूर असामान्य लग सकता है, लेकिन भारत की पारंपरिक रसोई में मांस के विभिन्न हिस्सों का उपयोग करने की परंपरा काफी पुरानी है।

7. मेघालय का दोह ख्लीह—सादा दिखता है, कहानी गहरी है

मेघालय का दोह ख्लीह पोर्क आधारित सलाद है, जिसमें प्याज, हरी मिर्च और नमक जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है।

मेघालय की पारंपरिक रसोई में मसालों का इस्तेमाल कई भारतीय क्षेत्रों की तुलना में अलग तरीके से होता है। यहां स्थानीय सामग्री, धुआं, किण्वन और प्राकृतिक स्वाद को खास महत्व दिया जाता है। मेघालय पर्यटन भी दोह ख्लीह को राज्य की पारंपरिक खाद्य संस्कृति का हिस्सा बताता है।

8. सूखी मछली और किण्वित स्वाद

पूर्वोत्तर भारत में सूखी और किण्वित मछली से बने कई व्यंजन मिलते हैं। मेघालय में टुंगटैप जैसी किण्वित मछली की चटनी को आलू के साथ खाया जाता है।

जिस तेज गंध को पहली बार आने वाला व्यक्ति असहज मान सकता है, वही स्थानीय भोजन में गहरे स्वाद की पहचान बन जाती है। मेघालय की खाद्य संस्कृति में किण्वन और धुएं में पकाने की तकनीक महत्वपूर्ण हैं।

9. उत्तराखंड की भांग की चटनी

नाम सुनते ही कई लोगों का ध्यान भटक सकता है, लेकिन उत्तराखंड की भांग की चटनी में नशीले पदार्थ के रूप में भांग का इस्तेमाल नहीं होता। यह मुख्य रूप से भांग के बीजों को भूनकर बनाई जाने वाली पारंपरिक पहाड़ी चटनी है।

इसे नमक, मिर्च और दूसरे स्थानीय मसालों के साथ पीसकर तैयार किया जाता है। पहाड़ी भोजन में ऐसी चटनियां भोजन का स्वाद बढ़ाने के साथ स्थानीय कृषि और उपलब्ध सामग्री से भी जुड़ी होती हैं।

10. बेनामी खीर—लहसुन से बनती है मिठाई!

लहसुन का नाम आते ही ज्यादातर लोगों के दिमाग में सब्जी, चटनी या तड़का आता है। लेकिन उत्तर भारत में बेनामी खीर नाम से जानी जाने वाली एक पारंपरिक मिठाई में लहसुन का इस्तेमाल किया जाता है।

लहसुन को दूध में लंबे समय तक पकाया जाता है ताकि उसका तीखा स्वाद कम हो जाए और उसका स्वरूप पूरी तरह बदल जाए। इसके बाद दूध और चीनी के साथ इसे खीर का रूप दिया जाता है।

यानी जिस चीज को हम आमतौर पर नमकीन भोजन का हिस्सा मानते हैं, वही यहां मिठाई में बदल जाती है।

11. बांस में पकता खाना

मेघालय और पूर्वोत्तर के कुछ इलाकों में बांस सिर्फ घर बनाने या हस्तशिल्प की चीज नहीं बल्कि रसोई का बर्तन भी है।

ताजा बांस की नली में चावल, मांस, मछली या सब्जियां भरकर उसे आग पर पकाया जाता है। बांस की हल्की सुगंध भोजन में उतर जाती है और पकाने का यह तरीका भोजन को एक विशिष्ट स्वाद देता है। मेघालय पर्यटन इसे राज्य की पारंपरिक Indigenous Cooking Techniques में शामिल करता है।

12. पिथा—एक नाम, दर्जनों स्वाद

पूर्वी भारत में पिथा सिर्फ एक व्यंजन नहीं बल्कि त्योहार और मौसम से जुड़ी खाद्य परंपरा है।

बिहार, बंगाल, ओडिशा और असम सहित कई क्षेत्रों में चावल के आटे से अलग-अलग प्रकार के पिथा बनाए जाते हैं। कहीं इसमें गुड़ और नारियल भरा जाता है तो कहीं नमकीन भरावन।

यही भारतीय खानपान की खासियत है—एक ही नाम अलग प्रदेश में अलग रूप ले लेता है।

13. रागी मुद्दे—सादगी में छिपा पहाड़ी स्वाद

कर्नाटक का रागी मुद्दे पहली नजर में किसी विदेशी को साधारण लग सकता है। रागी के आटे और पानी से तैयार यह गोल आकार का भोजन आमतौर पर सांभर या मांसाहारी करी के साथ खाया जाता है।

यह बताता है कि भारतीय पारंपरिक भोजन हमेशा महंगे मसालों या जटिल पकाने की प्रक्रिया पर निर्भर नहीं रहा। स्थानीय अनाज और सरल तकनीक भी स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन की आधारशिला रहे हैं।

14. भुट्टे का कीस—मक्के से बना ऐसा स्वाद जो मीठा भी, नमकीन भी

मध्य प्रदेश का भुट्टे का कीस भारतीय स्ट्रीट और घरेलू भोजन की ऐसी डिश है जिसमें मक्के को कद्दूकस कर दूध, घी और मसालों के साथ पकाया जाता है।

इसका स्वाद मीठे और नमकीन के बीच का अनोखा संतुलन देता है। विदेशी पर्यटक के लिए यह अनुभव इसलिए भी अलग हो सकता है क्योंकि मकई को इस तरह पकाने की कल्पना कई देशों में अलग होती है।

15. मुट्टमाला—अंडे की जर्दी से बनी मिठाई

केरल की मिठाइयों की दुनिया में मुट्टमाला बेहद अलग दिखाई देती है। इसमें अंडे की जर्दी और सफेद हिस्से का इस्तेमाल करके महीन, धागेनुमा संरचना बनाई जाती है।

देखने में यह किसी सजावटी मिठाई जैसी लगती है, लेकिन इसकी मुख्य सामग्री जानकर कई लोगों को आश्चर्य होता है।


आखिर क्यों इतना अलग है भारत का खाना?

भारत के अलग-अलग हिस्सों का भोजन सिर्फ स्वाद के कारण अलग नहीं हुआ। इसके पीछे भूगोल, जलवायु, जंगल, खेती, पशुपालन, समुद्र, धार्मिक मान्यताएं और स्थानीय समुदायों का अनुभव काम करता है।

मेघालय की खाद्य परंपरा इसका अच्छा उदाहरण है। वहां जंगली जड़ी-बूटियां, फर्न, बांस की कोपलें, मशरूम, जड़ें और दूसरे मौसमी खाद्य पदार्थ पारंपरिक भोजन का हिस्सा रहे हैं। किण्वन, धुएं में पकाना, बांस में खाना पकाना और प्राकृतिक राख से बने क्षारीय पदार्थों का इस्तेमाल भी वहां की पाक परंपरा का हिस्सा है।

यानी जिसे कोई विदेशी पर्यटक पहली नजर में “अजीब” समझ सकता है, उसके पीछे अक्सर स्थानीय पर्यावरण के साथ सदियों का तालमेल छिपा होता है।

विदेशी के लिए अजीब, भारतीय के लिए अपना

भारत की असली खूबसूरती यही है कि यहां खाने की कोई एक परिभाषा नहीं है। एक जगह लाल चींटी चटनी का स्वाद देती है, दूसरी जगह रेशम के कीड़े का प्यूपा पारंपरिक व्यंजन बन जाता है। कहीं बांस बर्तन बन जाता है तो कहीं लहसुन मिठाई में पहुंच जाता है।

इसलिए भारतीय खानपान को सिर्फ ‘इडली-डोसा’, ‘बटर चिकन’ और ‘बिरयानी’ तक सीमित करना इस विशाल खाद्य विरासत के साथ न्याय नहीं होगा।

भारत की थाली में जो जितना अलग दिखाई देता है, उसके पीछे उतनी ही गहरी कोई कहानी छिपी होती है।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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