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उत्तराखंड के 10 रहस्यमयी ‘भूतिया गांव’: कहीं युद्ध ने उजाड़ा, कहीं पलायन ने छोड़े सिर्फ खंडहर

खेत बचे, मकान बचे, लेकिन गांव छोड़कर चले गए लोग

उत्तराखंड के पहाड़ों में कई ऐसे गांव हैं जहां कभी बच्चों की किलकारियां, पशुओं की घंटियां और खेतों में काम करते लोगों की आवाजें सुनाई देती थीं। आज वहां कई मकानों पर ताले लटके हैं और रास्तों पर घास उग आई है। इन्हीं वीरान बस्तियों को आम बोलचाल में ‘घोस्ट विलेज’ यानी भूतिया गांव कहा जाता है। लेकिन इन गांवों की असली कहानी भूतों से कहीं ज्यादा दर्दनाक है—कहीं पलायन, कहीं रोजगार की कमी तो कहीं युद्ध और सीमावर्ती परिस्थितियों ने लोगों को घर छोड़ने पर मजबूर किया।

1. जादूंग: 1962 के युद्ध ने उजाड़ दिया पूरा गांव

उत्तरकाशी जिले की नेलांग घाटी में स्थित जादूंग उत्तराखंड के सबसे चर्चित वीरान गांवों में है। भारत-चीन युद्ध के बाद सुरक्षा कारणों से यहां रहने वाले लोगों को दूसरी जगह बसाया गया। इसके बाद गांव लंबे समय तक सुनसान पड़ा रहा।

कभी यह इलाका भारत और तिब्बत के बीच व्यापार का महत्वपूर्ण रास्ता था। आज पुराने पत्थर और लकड़ी के मकान यहां के बीते जीवन की याद दिलाते हैं। अब इसे पर्यटन से जोड़कर फिर से जीवंत करने की कोशिश हो रही है।

2. नीति गांव: सीमा पर बसा गांव और पलायन की कहानी

चमोली जिले की नीति घाटी के गांवों की कहानी भी पहाड़ की कठिन जिंदगी से जुड़ी है। सीमावर्ती इलाका होने के कारण यहां सर्दियों में लोगों का नीचे की ओर जाना पुरानी परंपरा रही है।

नीति क्षेत्र को लेकर “वीरान” होने की चर्चा को समझने के लिए मौसमी आवाजाही और स्थायी पलायन में अंतर करना जरूरी है। सीमा के नजदीक खाली होते गांवों को लेकर पलायन आयोग ने भी चिंता जताई थी।

3. बछाणस्यूं और पौड़ी के गांव: ताले बढ़े, लोग घटे

पौड़ी गढ़वाल जिले में खाली हुए गांवों की संख्या लंबे समय से बड़ी चिंता रही है। 2011 के आंकड़ों पर आधारित सूची में पौड़ी में 331 शून्य-आबादी वाले गांव दर्ज थे।

कई गांवों में घर तो आज भी खड़े हैं, लेकिन उनमें रहने वाला कोई नहीं। खेतों में खेती बंद होने के बाद जंगल और झाड़ियां फैलती गईं।

4. बैंगवाड़ी: गांव बचा, लेकिन परिवार बिखर गए

पौड़ी का बैंगवाड़ी पूरी तरह खाली गांव का उदाहरण नहीं है, लेकिन यहां की स्थिति बताती है कि कोई गांव “भूतिया” बनने की ओर कैसे बढ़ता है।

2025 की एक रिपोर्ट में गांव के बुजुर्ग निवासी ने बताया कि कई घरों में ताले हैं और परिवार दूसरे शहरों में जा चुके हैं। लोग अब मुख्य रूप से शादी या धार्मिक कार्यक्रमों जैसे मौकों पर गांव लौटते हैं।

5. भयेड़ी: 110 परिवारों से घटकर 52

बागेश्वर जिले का भयेड़ी भी तेजी से खाली होते पहाड़ी गांवों की कहानी कहता है। रिपोर्ट के अनुसार यहां कभी 110 परिवार रहते थे, जबकि अब करीब 52 परिवार रह गए हैं।

गांव के कई घरों पर जंग लगे ताले हैं और पुराने रास्तों पर घास उग चुकी है। स्थानीय लोगों के मुताबिक युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर चले गए।

6. थालदा: खेत बचे, किसान चले गए

उत्तराखंड के कई गांवों में खेती कभी जीवन का मुख्य आधार थी। लेकिन सिंचाई की कमी, रोजगार की तलाश और लगातार पलायन ने खेती को प्रभावित किया।

थालदा जैसे गांवों में खाली मकानों के साथ-साथ बंजर होते खेत भी इस बदलाव की कहानी बताते हैं।

7. टोली: जहां खेतों में अब झाड़ियां उगती हैं

टोली उन गांवों में शामिल है जिनका उदाहरण पलायन की रिपोर्टों में दिया गया है। कभी जिन खेतों में गेहूं, चावल, मंडुवा और दालें पैदा होती थीं, उनमें अब कई जगह खेती नहीं होती।

जब खेत खाली हुए तो धीरे-धीरे प्राकृतिक वनस्पति ने उन्हें ढक लिया। गांव का यह बदलाव बताता है कि पलायन सिर्फ घरों को नहीं, बल्कि पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बदल देता है।

8. खैरा: रोजगार के लिए छोड़ा पहाड़

खैरा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। रोजगार की तलाश में लोग दूसरे शहरों में गए और गांव की आबादी लगातार घटती गई।

दिलचस्प बात यह है कि कुछ लोग बाहर काम करने के बाद वापस भी लौटे। यानी हर कहानी हमेशा के लिए गांव छोड़ देने की नहीं है। कुछ जगहों पर रिवर्स माइग्रेशन भी हुआ है।

9. डुबर: वीरान घरों के बीच पहाड़ की पुरानी यादें

चंपावत जिले के डुबर जैसे गांव भी खाली होती पहाड़ी बस्तियों की तस्वीर पेश करते हैं। 2018 में पलायन आयोग के आंकड़ों में चंपावत समेत राज्य के कई जिलों में बड़ी संख्या में गांवों के खाली होने की बात सामने आई थी।

ऐसे गांवों में सबसे डरावना दृश्य कोई कथित भूत नहीं, बल्कि बंद दरवाजे, खाली आंगन और उजड़ते खेत हैं।

10. लंबे समय से वीरान गांव: असली डर पलायन का

उत्तराखंड में “भूतिया गांव” किसी एक गांव का नाम नहीं है। 2018 के पलायन आयोग के सर्वे के मुताबिक राज्य में 1,700 से अधिक गांवों के निर्जन होने की स्थिति सामने आई थी। रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी इसके प्रमुख कारणों में थीं।

2026 की रिपोर्टों में भी उत्तराखंड के गांवों में लगातार पलायन और कम होती आबादी की चिंता सामने आई है। वहीं कुछ गांवों में पर्यटन, नए रोजगार और दूसरी पहलों के जरिए लोगों की वापसी की कोशिशें भी हो रही हैं।

भूत नहीं, पलायन है इन गांवों का सबसे बड़ा रहस्य

उत्तराखंड के इन गांवों की कहानियों में रहस्य जरूर है, लेकिन उनके पीछे की वास्तविक वजह ज्यादा गंभीर है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और दूसरी सुविधाओं की कमी ने लोगों को शहरों की ओर जाने के लिए मजबूर किया।

2018 के सरकारी सर्वे में पिछले दशक के दौरान 1,18,981 लोगों के स्थायी पलायन और 734 गांवों के पूरी तरह खाली होने की बात सामने आई थी।

आज इन गांवों में खामोशी जरूर है, लेकिन कई जगह उम्मीद भी लौट रही है। पर्यटन, होमस्टे, स्थानीय उत्पाद और नए रोजगार के जरिए कुछ गांवों को फिर से बसाने की कोशिश हो रही है।


जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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