भारत के हर कोने से

कारगिल के पुराने बंकर से बच्चों की प्रयोगशाला तक: युद्ध के साए में पले शिक्षक ने बदल दी पढ़ाई की तस्वीर

लद्दाख के पाश्कुम में शिक्षक मोहम्मद मुस्तफा कमाल ने कक्षा को चार दीवारों तक सीमित नहीं रखा • मैदान, संग्रहालय, गुफा और पुराने सैन्य ढांचे को बनाया सीखने का माध्यम • 2026 में मिला राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार

शिक्षक का काम सिर्फ ब्लैकबोर्ड पर पाठ लिखना और बच्चों को किताब पढ़ाना नहीं होता। एक शिक्षक चाहे तो अपने आसपास की पूरी दुनिया को कक्षा में बदल सकता है। लद्दाख के कारगिल क्षेत्र के शिक्षक मोहम्मद मुस्तफा कमाल इसकी मिसाल हैं। उन्होंने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और युद्ध की स्मृतियों वाले इलाके में शिक्षा को नए तरीके से बच्चों तक पहुंचाने का प्रयास किया।

उनकी कहानी इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने बच्चों को सिर्फ किताबों के पन्नों तक सीमित नहीं रखा। पहाड़, गांव, संग्रहालय, गुफाएं, स्थानीय इतिहास और यहां तक कि पुराने सैन्य ढांचे भी उनकी शिक्षण पद्धति का हिस्सा बने। उनके अभिनव प्रयासों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और वर्ष 2026 में उन्हें राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

युद्ध की यादों के बीच पली सोच

कारगिल क्षेत्र में पले-बढ़े मुस्तफा कमाल ने संघर्षपूर्ण वातावरण को करीब से देखा। यही अनुभव शायद उनकी शिक्षा की सोच में भी दिखाई देता है। उन्होंने महसूस किया कि बच्चों को केवल किताबों में इतिहास पढ़ाने के बजाय अगर उन्हें इतिहास से जुड़े वास्तविक स्थानों तक ले जाया जाए तो सीखने का अनुभव कहीं अधिक प्रभावी हो सकता है।

इसी सोच के साथ उन्होंने पारंपरिक कक्षा से बाहर निकलकर बच्चों को उनके आसपास की दुनिया से जोड़ना शुरू किया।

पुराना सैन्य बंकर बना सीखने की जगह

मुस्तफा कमाल के काम का सबसे आकर्षक पहलू पुराने सैन्य ढांचे का शैक्षणिक उपयोग है। कारगिल युद्ध के बाद मौजूद पुराने सैन्य बंकर को उन्होंने बच्चों के सीखने के अनुभव से जोड़ने का प्रयास किया। रिपोर्टों के अनुसार, ऐसे परित्यक्त सैन्य बंकर का इस्तेमाल विज्ञान प्रयोगशाला के रूप में किया गया।

यह पहल अपने आप में एक बड़ा संदेश देती है—जिस स्थान की पहचान कभी युद्ध और संघर्ष से जुड़ी थी, उसे बच्चों के ज्ञान और प्रयोग की जगह में बदला जा सकता है।

किताब से बाहर निकली सामाजिक विज्ञान की पढ़ाई

मुस्तफा कमाल ने सामाजिक विज्ञान की पढ़ाई को भी नए तरीके से बच्चों तक पहुंचाया। उनके यहां विद्यार्थी केवल किताब पढ़कर किसी विषय को याद नहीं करते, बल्कि उससे जुड़े स्थानों और परिस्थितियों को देखकर समझने की कोशिश करते हैं।

इसके लिए उन्होंने फील्ड स्टडी, ग्राउंड क्लास और स्थानीय परिवेश आधारित शिक्षा को महत्व दिया। इससे बच्चों में सवाल पूछने, चीजों को देखने और स्वयं निष्कर्ष निकालने की आदत विकसित करने का प्रयास किया गया।

कक्षा में बनी संसद

उनकी शिक्षण पद्धति का एक और रोचक हिस्सा Parliamentary Classroom Approach है। इसमें बच्चों को संसद की कार्यप्रणाली जैसी गतिविधियों के माध्यम से लोकतंत्र और सामाजिक विज्ञान के विषय समझाए जाते हैं।

विद्यार्थी चर्चा करते हैं, अपनी बात रखते हैं, दूसरों की राय सुनते हैं और निर्णय लेने की प्रक्रिया को समझने की कोशिश करते हैं। इससे पढ़ाई केवल रटने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि बच्चों में संवाद और तर्क की क्षमता विकसित होती है।

संग्रहालय और गुफा भी बनी कक्षा

मुस्तफा कमाल की प्रयोगात्मक शिक्षा में Museum Classroom और Cave Classes का भी उल्लेख मिलता है। उनका प्रयास रहा कि बच्चों को अलग-अलग स्थानों पर ले जाकर वास्तविक परिस्थितियों से सीखने का अवसर दिया जाए।

लद्दाख जैसे क्षेत्र में जहां प्राकृतिक और ऐतिहासिक परिवेश अपने आप में बेहद अनूठा है, वहां यह तरीका बच्चों को अपने क्षेत्र को नए नजरिए से देखने का अवसर देता है।

छोटे स्कूल में बड़ा बदलाव

उनकी पहल का असर स्कूल के विद्यार्थियों की संख्या में भी दिखाई दिया। एनसीईआरटी में प्रकाशित एक केस स्टडी के अनुसार, पाश्कुम स्थित गवर्नमेंट मॉडल मिडिल स्कूल में वर्ष 2021 में 12 विद्यार्थी थे। नई शिक्षण पद्धतियों को अपनाने के बाद दो वर्ष से कम समय में विद्यार्थियों की संख्या करीब 50 तक पहुंच गई।

यह बदलाव बताता है कि यदि बच्चों के लिए स्कूल को रोचक और सीखने योग्य बनाया जाए तो सरकारी स्कूलों के प्रति आकर्षण भी बढ़ सकता है।

स्थानीय परिवेश को बनाया पाठ्यपुस्तक

मुस्तफा कमाल की सोच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा स्थानीय परिवेश है। पहाड़, मौसम, जलवायु, गांव, स्थानीय इतिहास और संस्कृति को उन्होंने शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया।

बच्चों को अपने आसपास की चीजों को केवल देखने के बजाय उनके बारे में सवाल करने और उनके पीछे छिपे कारणों को समझने के लिए प्रेरित किया गया। इस तरह लद्दाख की कठिन भौगोलिक परिस्थितियां बच्चों के लिए खुद एक खुली प्रयोगशाला बन गईं।

2026 में मिला राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार

मुस्तफा कमाल के इन प्रयासों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। वर्ष 2026 में उन्हें राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनका चयन इस बात का उदाहरण है कि शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप पढ़ाने के प्रयास किस तरह दूर तक प्रभाव डाल सकते हैं।

उनकी उपलब्धि सिर्फ एक पुरस्कार तक सीमित नहीं है। असली उपलब्धि यह है कि उन्होंने बच्चों के सामने यह सोच रखी कि सीखना केवल किताब खोलने का नाम नहीं है।

युद्धभूमि से ज्ञानभूमि तक

मुस्तफा कमाल की कहानी का सबसे भावनात्मक पहलू यही है कि जिस क्षेत्र की पहचान लंबे समय तक युद्ध और तनाव की खबरों से जुड़ी रही, उसी क्षेत्र में एक शिक्षक ने बच्चों के लिए शिक्षा की नई दुनिया बनाने का प्रयास किया।

पुराना बंकर हो या पहाड़, संग्रहालय हो या गुफा—उन्होंने इन सभी को बच्चों के लिए सीखने के अवसर में बदलने की कोशिश की।

उनकी कहानी शिक्षकों के लिए भी एक संदेश है कि संसाधनों की कमी हमेशा शिक्षा की कमी नहीं होती। सही सोच और रचनात्मक तरीका हो तो सीमित साधनों में भी बच्चों को बेहतर सीखने का अनुभव दिया जा सकता है।

शिक्षक की असली प्रयोगशाला है बच्चे की जिज्ञासा

मोहम्मद मुस्तफा कमाल की कहानी को सिर्फ एक पुरस्कार विजेता शिक्षक की कहानी मानना शायद कम होगा। यह कहानी उस सोच की है जिसमें शिक्षक बच्चों को जवाब देने के साथ-साथ सवाल पूछना भी सिखाता है।

कारगिल के कठिन भूगोल और युद्ध की स्मृतियों के बीच उन्होंने जिस तरह शिक्षा के नए रास्ते तलाशे, वह बताता है कि कक्षा की दीवारें शिक्षा की सीमा नहीं हैं।

जहां दूसरे लोगों को केवल पुराना बंकर दिखाई दे सकता है, वहीं एक शिक्षक उसमें बच्चों के भविष्य की प्रयोगशाला देख सकता है। यही सोच मुस्तफा कमाल को अलग बनाती है।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

Related Articles

Back to top button