आसमान के सफाईकर्मी गिद्ध: कभी करोड़ों में थे, अब विलुप्ति की कगार पर; जटायु की धरती पर इनके अस्तित्व की लड़ाई
अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस आज: एक दवा ने तबाह कर दी गिद्धों की दुनिया, अब संरक्षण केंद्रों से खुले आसमान तक लौटाने की कोशिश
कभी भारत के गांवों, जंगलों और खुले मैदानों के आसमान में गिद्धों के बड़े-बड़े झुंड नजर आते थे। किसी मृत पशु के आसपास कुछ ही समय में दर्जनों गिद्धों का पहुंचना आम बात थी। लेकिन आज वही दृश्य कई इलाकों में दुर्लभ हो चुका है। गिद्धों की संख्या में आई भारी गिरावट दुनिया के सबसे बड़े वन्यजीव संकटों में गिनी जाती है।
5 सितंबर 2026 यानी आज अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस है। हर साल सितंबर के पहले शनिवार को मनाया जाने वाला यह दिवस उस पक्षी की ओर दुनिया का ध्यान खींचता है जिसे अक्सर लोग डरावना या अशुभ मानते हैं, जबकि प्रकृति में इसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यह दिन गिद्धों के महत्व, उनके सामने मौजूद खतरों और उन्हें बचाने के लिए चल रहे प्रयासों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए मनाया जाता है।
गिद्ध केवल मृत पशुओं को खाने वाले पक्षी नहीं हैं। वे प्रकृति की चलती-फिरती सफाई व्यवस्था हैं। मृत पशुओं के शवों को तेजी से साफ कर वे पारिस्थितिकी तंत्र को स्वस्थ बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस क्यों मनाया जाता है?
गिद्धों के प्रति लोगों की गलत धारणा बदलना इस दिवस का प्रमुख उद्देश्य है। अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस हर वर्ष सितंबर के पहले शनिवार को मनाया जाता है। दुनियाभर में इस दिन जागरूकता कार्यक्रम, पक्षी दर्शन, स्कूल कार्यक्रम, कार्यशालाएं और संरक्षण अभियान आयोजित किए जाते हैं।
2026 में भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में इस अवसर पर कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। मध्य प्रदेश के भोपाल स्थित वन विहार राष्ट्रीय उद्यान में 5-6 सितंबर को बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी और मध्य प्रदेश वन विभाग के सहयोग से गिद्ध जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। तमिलनाडु में भी 5-6 सितंबर को जागरूकता गतिविधियां प्रस्तावित हैं।
यानी जिस पक्षी को कभी नजरअंदाज किया गया, उसके लिए आज पूरी दुनिया आवाज उठा रही है।
गिद्ध क्यों हैं प्रकृति के सबसे जरूरी सफाईकर्मी?
गिद्धों का मुख्य भोजन मृत जानवरों के शव हैं। उनकी मजबूत चोंच और विशेष पाचन तंत्र उन्हें सड़े हुए मांस को भी खाने और पचाने में सक्षम बनाता है।
अगर कोई पशु मर जाए और उसका शव खुले में पड़ा रहे तो वहां रोग फैलाने वाले सूक्ष्मजीव बढ़ सकते हैं। गिद्ध ऐसे शवों को तेजी से खाकर पर्यावरण से जैविक अवशेष हटाते हैं।
इसी कारण अंतरराष्ट्रीय संरक्षण संस्थाएं गिद्धों को Nature’s Clean-Up Crew यानी प्रकृति की सफाई टीम कहती हैं।
इनका गायब होना केवल एक पक्षी का कम होना नहीं है, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव का संकेत है।
भारत में गिद्धों की कितनी प्रजातियां हैं?
भारत में कई गिद्ध प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें प्रमुख हैं—
- सफेद पीठ वाला गिद्ध (Gyps bengalensis)
- भारतीय/लंबी चोंच वाला गिद्ध (Gyps indicus)
- पतली चोंच वाला गिद्ध (Gyps tenuirostris)
- लाल सिर वाला गिद्ध (Sarcogyps calvus)
- मिस्र का गिद्ध (Neophron percnopterus)
- दाढ़ी वाला गिद्ध (Gypaetus barbatus)
- हिमालयी ग्रिफॉन (Gyps himalayensis)
- यूरेशियन ग्रिफॉन (Gyps fulvus)
- सिनेरियस गिद्ध (Aegypius monachus)
इनमें सफेद पीठ वाला, भारतीय और पतली चोंच वाला गिद्ध सबसे गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल: आखिर गिद्ध अचानक कहां गायब हो गए?
1990 के दशक में भारत और दक्षिण एशिया में गिद्धों की संख्या में अचानक और तेजी से गिरावट शुरू हुई। कई क्षेत्रों में उनकी आबादी 99 प्रतिशत से अधिक घट गई।
शुरुआत में वैज्ञानिकों के लिए यह एक रहस्य था कि बड़ी संख्या में स्वस्थ दिखने वाले गिद्ध अचानक क्यों मर रहे हैं।
जांच आगे बढ़ी तो इस संकट की सबसे महत्वपूर्ण वजह सामने आई—डाइक्लोफेनाक नाम की पशु चिकित्सा दवा।
एक दर्द की दवा बनी गिद्धों के लिए मौत का कारण
डाइक्लोफेनाक पशुओं में दर्द और सूजन कम करने के लिए इस्तेमाल की जाती थी। जब यह दवा दिए गए मवेशी की मृत्यु होती और उसका शव गिद्ध खाते, तो दवा का अवशेष गिद्ध के शरीर में पहुंच जाता था।
इससे गिद्धों की किडनी गंभीर रूप से प्रभावित होती और उनकी मौत हो जाती।
गिद्धों की भारी गिरावट के पीछे डाइक्लोफेनाक की भूमिका सामने आने के बाद भारत ने 2006 में पशु चिकित्सा उपयोग के लिए डाइक्लोफेनाक पर प्रतिबंध लगा दिया।
हालांकि संरक्षण विशेषज्ञ आज भी अन्य पशु दर्द निवारक दवाओं के इस्तेमाल को लेकर सतर्क रहने की जरूरत बताते हैं।
गिद्ध खत्म हुए तो पर्यावरण पर पड़ा असर
गिद्धों की संख्या कम होने से मृत पशुओं के शवों को प्राकृतिक रूप से साफ करने वाली व्यवस्था कमजोर हुई।
प्रकृति में हर जीव की एक भूमिका होती है। गिद्ध उस भूमिका को निभाते हुए मृत जीवों के अवशेषों को जल्दी खत्म करते हैं।
इसीलिए गिद्धों की मौजूदगी को स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र से जोड़ा जाता है। अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस का एक प्रमुख संदेश भी यही है कि इन पक्षियों को ‘घृणित’ या ‘अशुभ’ समझने के बजाय उनके पर्यावरणीय महत्व को समझा जाए।
गिद्धों को बचाने के लिए भारत में क्या हो रहा है?
गिद्ध संरक्षण के लिए भारत में कई स्तरों पर काम किया जा रहा है।
पशु चिकित्सा में गिद्धों के लिए खतरनाक दवाओं को नियंत्रित करने के साथ-साथ संरक्षण प्रजनन केंद्र बनाए गए हैं। यहां गंभीर संकटग्रस्त प्रजातियों को सुरक्षित वातावरण में प्रजनन कराया जाता है।
इसके अलावा Vulture Safe Zone यानी गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र विकसित करने की कोशिश की जा रही है। इन क्षेत्रों में यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाता है कि गिद्धों को मिलने वाले मृत पशुओं के शवों में उनके लिए जहरीली दवाओं के अवशेष न हों।
गिद्धों के प्राकृतिक आवास, घोंसले और भोजन की उपलब्धता पर भी नजर रखी जाती है।
पिंजौर का जटायु संरक्षण केंद्र बना उम्मीद की किरण
हरियाणा के पिंजौर में स्थित जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र गिद्धों को बचाने की मुहिम का महत्वपूर्ण केंद्र है।
यहां मुख्य रूप से सफेद पीठ वाले, भारतीय और पतली चोंच वाले गिद्धों के संरक्षण और प्रजनन पर काम किया जाता है।
संरक्षण केंद्रों में पैदा हुए गिद्धों को स्वस्थ होने के बाद उपयुक्त प्राकृतिक क्षेत्रों में वापस छोड़ने की दिशा में भी काम हो रहा है।
यानी उद्देश्य केवल गिद्धों को कैद में बढ़ाना नहीं, बल्कि उन्हें एक दिन फिर से खुले आसमान में स्वतंत्र रूप से उड़ते देखना है।
गिद्धों के बीच ‘जटायु’ की कहानी क्यों खास है?
भारतीय संस्कृति में गिद्ध का सबसे प्रसिद्ध नाम जटायु है।
रामायण में जटायु को एक महान गिद्ध के रूप में वर्णित किया गया है। जब रावण माता सीता का हरण करके ले जा रहा था, तब जटायु ने उसे रोकने का प्रयास किया।
उन्होंने रावण से युद्ध किया और सीता की रक्षा के लिए अपना जीवन दांव पर लगा दिया। घायल अवस्था में भी उन्होंने भगवान राम को सीता के हरण की जानकारी दी।
इस वजह से जटायु भारतीय परंपरा में साहस, त्याग और नारी सम्मान की रक्षा के प्रतीक बन गए।
यहां यह समझना जरूरी है कि रामायण के जटायु एक पौराणिक पात्र हैं और आधुनिक विज्ञान में पाई जाने वाली किसी एक गिद्ध प्रजाति का नाम जटायु नहीं है।
जटायु के नाम पर गिद्धों को बचाने की मुहिम
पिंजौर के संरक्षण केंद्र का नाम जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र रखा जाना इस सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक संरक्षण प्रयास के बीच अनोड़ा संबंध बनाता है।
एक ओर हजारों वर्ष पुरानी कथा में जटायु जीवन की बाजी लगाकर सीता की रक्षा करते हैं, वहीं दूसरी ओर आज उसी पक्षी समूह को इंसानी गतिविधियों से बचाने के लिए वैज्ञानिक और वन्यजीव विशेषज्ञ प्रयास कर रहे हैं।
यह विरोधाभास भी बेहद दिलचस्प है—कभी इंसान के लिए बलिदान देने वाले जटायु के वंशजों के अस्तित्व की रक्षा अब इंसान के हाथ में है।
क्या गिद्धों की वापसी संभव है?
उम्मीद अभी खत्म नहीं हुई है।
दवाओं के खतरनाक प्रभाव को नियंत्रित करने, संरक्षण प्रजनन केंद्रों में संख्या बढ़ाने, सुरक्षित क्षेत्रों को विकसित करने, वैज्ञानिक निगरानी और पुनर्वास के जरिए गिद्धों को बचाने की कोशिश जारी है।
2025 में Wildlife Institute of India ने भारत में गिद्धों की स्थिति को समझने के लिए अखिल भारतीय आकलन और निगरानी की अंतिम रिपोर्ट जारी की। ऐसे वैज्ञानिक सर्वेक्षण भविष्य की संरक्षण रणनीति बनाने में महत्वपूर्ण हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गिद्धों को बचाने के लिए जागरूकता बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस का उद्देश्य भी यही है कि दुनिया गिद्धों को समझे, उनके प्रति गलत धारणाएं दूर हों और संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास किए जाएं।
क्या हम जटायु के वंशजों को बचा पाएंगे?
गिद्धों की कहानी हमें प्रकृति के साथ इंसानी रिश्ते का आईना दिखाती है।
एक समय आसमान में हजारों गिद्धों का मंडराना सामान्य था। फिर इंसानों की एक दवा ने उनकी पूरी आबादी को संकट में डाल दिया। अब वही इंसान उन्हें बचाने के लिए संरक्षण केंद्र बना रहा है, सुरक्षित क्षेत्र तैयार कर रहा है और उन्हें दोबारा जंगलों में बसाने की कोशिश कर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस सिर्फ एक पक्षी के सम्मान का दिन नहीं है। यह याद दिलाने का दिन है कि प्रकृति में कोई भी जीव बेकार नहीं होता।
रामायण का जटायु अपने प्राण देकर धर्म और सम्मान की रक्षा करते हैं। आज के गिद्ध बिना किसी शोर के प्रकृति की रक्षा कर रहे हैं।
फर्क सिर्फ इतना है कि तब जटायु ने इंसान को बचाया था, और आज इंसान की बारी है कि वह गिद्धों को बचाए।



