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एक गांव, सैकड़ों जुड़वा जोड़े और रहस्य बरकरार—पानी, खान-पान से लेकर DNA तक हुई जांच, विज्ञान भी फेल

दुनिया के दूसरे ट्विन हॉटस्पॉट से तुलना, फिर भी कोडीनही का रहस्य पूरी तरह नहीं सुलझा

भारत में ऐसे कई गांव हैं जो अपनी संस्कृति, खान-पान या प्राकृतिक खूबसूरती के लिए मशहूर हैं। लेकिन केरल के मल्लपुरम जिले का कोडीनही गांव अपनी एक ऐसी खासियत के लिए जाना जाता है, जो इसे दुनिया के दूसरे गांवों से अलग बनाती है।

यहां सामान्य आबादी की तुलना में जुड़वा बच्चों की संख्या असाधारण रूप से अधिक बताई जाती है। इसी वजह से कोडीनही को लोकप्रिय रूप से ‘ट्विन टाउन’ या ‘जुड़वा बच्चों का गांव’ कहा जाता है।

गांव की गलियों, स्कूलों और स्थानीय कार्यक्रमों में एक जैसी शक्ल वाले बच्चों के कई जोड़े दिखाई देना यहां के लिए कोई असामान्य दृश्य नहीं है। लेकिन यही बात बाहर से आने वाले लोगों के लिए कौतूहल का विषय बन जाती है।

करीब 2,000 परिवार और सैकड़ों जुड़वा जोड़े

स्रोत-इंटरनेट मीडिया

कोडीनही से जुड़े विभिन्न अध्ययनों और स्थानीय संगठनों के आंकड़ों में यहां जुड़वा बच्चों की संख्या सैकड़ों में बताई गई है। करीब 2,000 परिवारों वाले इस गांव में 500 से अधिक जुड़वा और कुछ ट्रिपलेट्स होने की जानकारी सामने आती रही है।

जुड़वा जन्मों की यह दर सामान्य वैश्विक औसत से काफी अधिक बताई जाती है। यही असामान्य आंकड़ा कोडीनही को चिकित्सा और आनुवंशिकी के शोधकर्ताओं के लिए दिलचस्प बनाता है।

हालांकि, अलग-अलग वर्षों और अध्ययनों में गांव की कुल आबादी तथा जुड़वा बच्चों की संख्या अलग-अलग मिल सकती है। इसलिए इन आंकड़ों को एक निश्चित वर्तमान जनगणना आंकड़ा मानने के बजाय उपलब्ध अध्ययनों और स्थानीय रिकॉर्ड के संदर्भ में देखना बेहतर है।

1940-50 के दशक से शुरू हुई कहानी?

स्थानीय लोगों के अनुसार, गांव में जुड़वा बच्चों के अधिक जन्म लेने की कहानी कई पीढ़ियों पुरानी है। बुजुर्गों का कहना है कि यह सिलसिला करीब तीन से चार पीढ़ी पहले, यानी 1940-50 के दशक के आसपास दिखाई देना शुरू हुआ।

इसके बाद आने वाली पीढ़ियों में जुड़वा बच्चों की संख्या बढ़ती गई। धीरे-धीरे यह गांव अपनी इसी खासियत के कारण आसपास के इलाकों से अलग पहचान बनाने लगा।

आज कोडीनही का नाम सामने आते ही लोगों के दिमाग में सबसे पहले एक ही सवाल आता है—आखिर यहां इतने जुड़वा बच्चे क्यों पैदा होते हैं?

पानी बदला, खान-पान देखा, फिर भी नहीं मिला जवाब

जब किसी इलाके में किसी विशेष जैविक घटना की दर असामान्य रूप से अधिक दिखाई देती है तो वैज्ञानिक उसके पीछे पर्यावरण, खान-पान, जीवनशैली और आनुवंशिकी जैसे कई संभावित कारणों की जांच करते हैं।

कोडीनही में भी शुरुआती दौर में पानी और भोजन को संभावित कारण माना गया। यह जानने की कोशिश हुई कि क्या गांव के पानी में कोई ऐसा खनिज या रासायनिक तत्व है जो जुड़वा गर्भधारण की संभावना बढ़ाता हो।

लेकिन स्थानीय लोगों की जीवनशैली और भोजन केरल के दूसरे इलाकों से पूरी तरह अलग नहीं पाया गया। इससे केवल पानी या खान-पान को इस असामान्य स्थिति का स्पष्ट कारण मानना मुश्किल हो गया।

IVF और फर्टिलिटी दवाओं से भी नहीं जुड़ता मामला

आधुनिक चिकित्सा में IVF और कुछ फर्टिलिटी उपचारों से जुड़वा गर्भधारण की संभावना बढ़ सकती है। लेकिन कोडीनही की कहानी इन आधुनिक तकनीकों से बहुत पुरानी है।

गांव में जुड़वा बच्चों के जन्म का सिलसिला उस दौर से बताया जाता है जब IVF जैसी तकनीकें आम लोगों के जीवन का हिस्सा नहीं थीं। इसलिए यहां की असाधारण जुड़वा जन्म दर को केवल आधुनिक प्रजनन तकनीकों से समझाना संभव नहीं है।

क्या जीन में छिपा है पूरा राज?

यही वह सवाल है जिसने आनुवंशिकी विशेषज्ञों की दिलचस्पी सबसे ज्यादा बढ़ाई है।

वैज्ञानिकों ने संभावना जताई है कि कोडीनही के लोगों में कोई आनुवंशिक विशेषता जुड़वा गर्भधारण की अधिक संभावना से संबंधित हो सकती है। हालांकि, किसी एक विशिष्ट जीन या आनुवंशिक बदलाव को इस घटना का अंतिम और प्रमाणित कारण घोषित करना अभी जल्दबाजी होगी।

इस मामले में एक महत्वपूर्ण स्थानीय अवलोकन भी सामने आता है। बताया जाता है कि कोडीनही की कुछ महिलाएं जब दूसरे क्षेत्रों में विवाह करके गईं, तब भी उनके यहां जुड़वा बच्चों का जन्म हुआ।

अगर यह पैटर्न बड़े और नियंत्रित वैज्ञानिक अध्ययनों से प्रमाणित होता है तो इससे आनुवंशिक कारण की संभावना और मजबूत हो सकती है।

वैज्ञानिकों ने लिए DNA और लार के नमूने

कोडीनही का रहस्य सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहा। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद ट्विन-हॉटस्पॉट को समझने की कोशिश कर रहे शोधकर्ताओं ने भी इस गांव में रुचि दिखाई।

बताया जाता है कि 2016 में भारत के सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (CCMB), हैदराबाद समेत भारत और विदेशों के वैज्ञानिकों की टीम ने कोडीनही के ग्रामीणों के DNA और लार के नमूने एकत्र किए।

इस तरह के अध्ययन का उद्देश्य यह समझना था कि क्या कोडीनही के लोगों में कोई ऐसी आनुवंशिक विशेषता मौजूद है, जो दुनिया के दूसरे जुड़वा-बहुल क्षेत्रों में रहने वाली आबादी से मिलती-जुलती है।

नाइजीरिया के इग्बो-ओरा और ब्राजील के कैंडिडो गोडोई जैसे स्थान भी अपनी असामान्य रूप से अधिक जुड़वा जन्म दर के लिए चर्चित रहे हैं। इसलिए इन क्षेत्रों के बीच आनुवंशिक समानता का अध्ययन वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण विषय रहा है।

स्कूलों में एक जैसे चेहरों की कतार

स्रोत-इंटरनेट मीडिया

कोडीनही की सबसे दिलचस्प तस्वीर गांव के स्कूलों में दिखाई देती है। एक ही कक्षा में एक जैसे चेहरे वाले दो बच्चों का होना यहां असामान्य नहीं माना जाता।

कभी-कभी शिक्षक भी बच्चों को पहचानने के लिए उनके नाम, व्यवहार या दूसरी पहचान पर निर्भर करते हैं। बाहर से आने वाले लोगों के लिए तो यह अनुभव और भी दिलचस्प होता है।

एक जैसी शक्ल, एक जैसी उम्र और कई बार एक जैसी पोशाक—ऐसे जुड़वा बच्चों की मौजूदगी कोडीनही के स्कूलों को दूसरे इलाकों से अलग दृश्य देती है।

जुड़वा बच्चों ने बनाई अपनी संस्था

गांव के लोगों ने अपनी इस अनोखी पहचान को सिर्फ कौतूहल तक सीमित नहीं रखा। जुड़वा बच्चों और उनके परिवारों के लिए Twins and Kins Association (TAKA) जैसी स्थानीय पहल का उल्लेख मिलता है।

ऐसी संस्थाओं का उद्देश्य जुड़वा बच्चों और उनके परिवारों को स्वास्थ्य, शिक्षा तथा सामाजिक सहयोग उपलब्ध कराने के साथ इस अनोखी पहचान को व्यवस्थित तरीके से सहेजना है।

यानी कोडीनही में जुड़वा होना केवल जैविक संयोग नहीं, बल्कि धीरे-धीरे गांव की सामाजिक पहचान का हिस्सा भी बन गया है।

क्या कोडीनही का रहस्य कभी पूरी तरह सुलझेगा?

कोडीनही को लेकर सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां जुड़वा बच्चों की असाधारण संख्या के बावजूद एक सर्वमान्य और अंतिम वैज्ञानिक कारण अभी स्थापित नहीं हुआ है।

संभावित आनुवंशिक कारक, पर्यावरणीय प्रभाव और दूसरे जैविक कारणों को लेकर अध्ययन होते रहे हैं। लेकिन किसी एक कारण को निश्चित रूप से जिम्मेदार ठहराने के लिए बड़े, लंबे और नियंत्रित वैज्ञानिक अध्ययनों की जरूरत होगी।

यही वजह है कि कोडीनही आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक दिलचस्प प्राकृतिक प्रयोगशाला जैसा क्षेत्र बना हुआ है।

रहस्य से पहचान तक का सफर

कोडीनही की कहानी सिर्फ जुड़वा बच्चों की संख्या की कहानी नहीं है। यह इस बात का उदाहरण भी है कि किसी समुदाय की असामान्य जैविक विशेषता कैसे धीरे-धीरे उसकी सांस्कृतिक पहचान बन सकती है।

जहां वैज्ञानिक इसके पीछे के कारण खोज रहे हैं, वहीं गांव के लोग इस अनोखी पहचान के साथ सामान्य जीवन जी रहे हैं। स्कूलों में साथ पढ़ते जुड़वा बच्चे, परिवारों में जुड़वा भाई-बहन और गांव की गलियों में एक जैसे चेहरों की मौजूदगी कोडीनही को दुनिया के सबसे दिलचस्प ‘ट्विन टाउन’ में शामिल करती है।

आखिर कोडीनही में जुड़वा बच्चों की संख्या इतनी ज्यादा क्यों है? इसका पूरा जवाब अभी विज्ञान के पास नहीं है। यही अधूरा जवाब इस छोटे से केरल गांव को आज भी दुनिया के लिए एक बड़ी पहेली बनाए हुए है।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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