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काशी के अद्भुत शिवलिंग: 900 साल पुराने पातालेश्वर से लेकर तिल-तिल बढ़ते जागेश्वर महादेव का दिव्य रहस्य

जब 5 मीटर की धोती भी पड़ जाए छोटी: जानिए नरहरपुरा के विशाल जागेश्वर की महिमा

वाराणसी। मोक्षदायिनी काशी केवल मंदिरों का शहर नहीं, बल्कि भगवान शिव की वह दिव्य नगरी है जहां का कण-कण शंकर स्वरूप है। यहां शिव के रूपों की महिमा जितनी अनूठी है, उतना ही आश्चर्यजनक उनका आकार, बनावट और स्थापना का इतिहास है। पंचक्रोशी परिक्रमा में स्थित मात्र आधा इंच के रामेश्वर महादेव हों या उनसे 120 गुना विशाल बाबा जागेश्वर—काशी में शिवलिंगों की विविधता अध्यात्म और विज्ञान दोनों दृष्टिकोणों से शोध का विषय है।

यहां धरातल से 30 से 40 फीट नीचे गुफाओं और बेसमेंट में स्थापित भूमिगत महादेव के दर्शन होते हैं, तो कहीं ऐसे शिवलिंग भी हैं जो स्वयं आकार में बढ़ रहे हैं। आइए जानते हैं काशी के इन अनोखे और रहस्यमयी शिवलिंगों की गाथा।

विशालता और सूक्ष्मता का अद्भुत संगम

काशी में शिव के स्वरूपों की विविधता देखते ही बनती है। वरुणा तट पर स्थित रामेश्वर महादेव का शिवलिंग मात्र आधा इंच ऊंचा और दो इंच चौड़ा है, जो पंचक्रोशी यात्रा का तीसरा पड़ाव भी है। वहीं दूसरी ओर, नरहरपुरा स्थित बाबा जागेश्वर महादेव का शिवलिंग पांच फीट लंबा और तीन फीट चौड़ा है। इनकी विशालता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन्हें लपेटने के लिए पांच मीटर की धोती भी छोटी पड़ जाती है और दर्शन पूजन के लिए पूरे छह मीटर की धोती का उपयोग किया जाता है।

तिलभांडेश्वर महादेव: स्रोत- विकिपीडिया

इसके अलावा, मदनपुरा के तिलभांडेश्वर महादेव का स्वयंभू शिवलिंग साढ़े तीन फीट ऊंचा और तीन फीट चौड़ा है। मान्यता है कि यह शिवलिंग हर साल तिल-तिल करके स्वयं बढ़ता है।

विद्वानों के मत:

  • प्रो. नागेंद्र पांडेय (पूर्व अध्यक्ष, श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर न्यास): “भक्त ने जिस रूप या आकार में प्रभु की उपासना और आराधना की, उसी भाव में उसे प्रभु की प्राप्ति हुई। काशी के शिवलिंगों की स्थापना ऋषियों, राजाओं, गणितज्ञों और स्वयं देव-स्वरूपों द्वारा की गई है।”
  • शिव प्रसाद पांडेय (महंत, बड़ी शीतला मंदिर): “काशी के एक-एक कंकड़ को शिवलिंग मानकर जल चढ़ाने से श्रीकाशी विश्वनाथ के दर्शन-पूजन के समान ही पुण्य प्राप्त होता है।”

भूमिगत शिवधाम: 40 फीट नीचे गुफाओं में जलधारा

काशी में काशी करवट सहित ऐसे पाँच प्रमुख शिवलिंग हैं जिनका जलाभिषेक धरातल पर न होकर भूमिगत बेसमेंट में होता है।

पातालेश्वर महादेव: स्रोत- विकिपीडिया
  • पातालेश्वर महादेव: बंगाली टोला क्षेत्र में 900 साल पुराने इस मंदिर में दर्शन के लिए जमीन से लगभग 40 फीट नीचे उतरना पड़ता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महान खगोलविद भास्कराचार्य ने इस शिवलिंग की स्थापना वैज्ञानिक व आध्यात्मिक दृष्टिकोण से की थी।
  • गंगेश्वर महादेव: संकटा गली के एक कटरस से होकर खिड़की के माध्यम से घाट से 30 फीट नीचे विराजमान गंगेश्वर महादेव के दर्शन होते हैं। इन्हें गंगा नदी का स्वामी माना जाता है।
  • पितामहेश्वर एवं मणिकर्णिकेश्वर: मणिकर्णिका घाट स्थित गऊ मठ में मणिकर्णिकेश्वर और शीतला गली के पितामहेश्वर महादेव दोनों ही धरातल से 30 से 40 फीट नीचे भूमिगत स्वरूप में विराजमान हैं।
  • काशी करवट महादेव: चौक के नेपाली खपड़ा में स्थित यह मंदिर कुएंनुमा बनावट में जमीन से 30 फीट नीचे स्थापित है।
काशी करवट महादेव: स्रोत-विकिपीडिया

खगोलीय, पौराणिक और अद्भुत स्वरूप

काशी के शिवलिंगों में केवल आकार ही नहीं, बल्कि उनकी बनावट भी रहस्यमयी है:

शिवलिंग का नामस्थानविशेष पौराणिक व वैज्ञानिक विशेषता
गौरी केदारेश्वरकेदारखंडअरघे में चपटा शिवलिंग, जो दो भागों में विभाजित है। एक भाग में भगवान शिव और दूसरे में भगवान विष्णु विराजमान हैं।
शूलटंकेश्वर महादेवमाधोपुर3 फीट ऊंचा शिवलिंग। मान्यता है कि गंगा के वेग को नियंत्रित करने के लिए शिव जी ने यहाँ अपना त्रिशूल गाड़ा था।
लोलार्केश्वर महादेवभदैनीजमीन से 30 फीट नीचे स्थापित। पास ही ऐतिहासिक लोलार्क कुंड है जहां सूर्य देव ने तपस्या की थी।
मल्लिकार्जुन महादेवकोयला बाजारपहाड़नुमा ऊंचे टीले पर स्थापित अनोखा शिवलिंग।
हटकेश्वर महादेवहड़हा सराय30 फीट नीचे स्थित भूमिगत शिवलिंग, जहां पूर्वांचल के व्यापारियों की अटूट आस्था है।

पर्यटन और आध्यात्मिक यात्रा

यदि आप काशी भ्रमण की योजना बना रहे हैं, तो केवल मुख्य मंदिरों तक सीमित न रहें। संकरी गलियों, घाटों और धरातल के नीचे बसे इन ऐतिहासिक शिवलिंगों के दर्शन आपके आध्यात्मिक अनुभव को एक नया आयाम देंगे। काशी का प्रत्येक शिवलिंग भक्ति, इतिहास और भारतीय ज्ञान-परंपरा की अनूठी कहानी बयां करता है।

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