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लद्दाख की रंग बदलती पहाड़ियां: कभी लाल तो कभी सुनहरी, आखिर क्या है इस प्राकृतिक रहस्य की कहानी?

कभी लाल, कभी पीली तो कभी बैंगनी नजर आती हैं चट्टानें

लद्दाख का नाम आते ही आंखों के सामने बर्फीली चोटियां, ऊंचे दर्रे, नीली झीलें और सूखे पहाड़ों का नजारा उभरता है। लेकिन इस हिमालयी क्षेत्र में प्रकृति का एक और रूप देखने को मिलता है। यहां कई जगह पहाड़ियां एक ही रंग की नहीं दिखतीं। कहीं चट्टानें पीली और सुनहरी नजर आती हैं तो कहीं लाल, भूरी, हरी, बैंगनी और धूसर रंग की परतें दिखाई देती हैं।

पश्चिमी लद्दाख का लामायुरू इस तरह के अनोखे भू-दृश्य के लिए खास तौर पर प्रसिद्ध है। इसे पर्यटन की भाषा में अक्सर ‘मूनलैंड’ या ‘चंद्रमा जैसा भू-दृश्य’ कहा जाता है। लद्दाख प्रशासन भी लामायुरू के असामान्य भूगर्भीय स्वरूप को उसके प्रमुख आकर्षणों में गिनता है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या यहां के पहाड़ सच में अपना रंग बदलते हैं? या फिर इसके पीछे कोई भूगर्भीय कहानी छिपी है?

लद्दाख की पहाड़ियों में दिखते हैं इतने रंग

लद्दाख के कई हिस्सों में चट्टानों के रंगों में काफी विविधता दिखाई देती है। कुछ क्षेत्रों में पीले, भूरे, हरे और बैंगनी रंगों वाली चट्टानें भी देखी गई हैं। चट्टानों में मौजूद खनिज, उनकी संरचना और अलग-अलग भूगर्भीय परतें इस रंग विविधता में भूमिका निभाती हैं।

लद्दाख की पहाड़ियों पर वनस्पति भी बहुत कम है। इसलिए चट्टानों की प्राकृतिक सतह दूर से साफ दिखाई देती है। यही वजह है कि यहां की भूगर्भीय संरचना पर्यटकों को सामान्य पहाड़ों से बिल्कुल अलग नजर आती है।

क्या सच में पहाड़ अपना रंग बदलते हैं?

यहां का सबसे दिलचस्प सवाल यही है। वास्तव में पहाड़ किसी जीव की तरह अपना रंग नहीं बदलते। अलग-अलग समय पर पड़ने वाली सूर्य की रोशनी, छाया और मौसम की स्थिति चट्टानों के रंग को अलग तरीके से उभारती है।

सुबह या शाम के समय जब सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं, तो पहाड़ों पर लाल, नारंगी और सुनहरे रंग ज्यादा गहरे दिखाई दे सकते हैं। दोपहर की तेज रोशनी में वही चट्टानें अपेक्षाकृत हल्की या धूसर नजर आ सकती हैं।

यानी रंग बदलने का एहसास वास्तविक है, लेकिन इसके पीछे प्राकृतिक प्रकाश और चट्टानों की संरचना का योगदान है।

लामायुरू को क्यों कहा जाता है ‘मूनलैंड’?

लामायुरू लेह-श्रीनगर मार्ग पर स्थित है और लेह से करीब 127 किलोमीटर दूर है। यह समुद्र तल से लगभग 3,510 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां की पहाड़ियों में जगह-जगह अजीब आकार की मिट्टी और चट्टानी संरचनाएं दिखाई देती हैं। इसी कारण इसका भू-दृश्य चंद्रमा की सतह जैसा महसूस होता है।

यहां की ढलानों पर कटाव से बनी आकृतियां और हल्के रंग की परतें दूर से किसी दूसरे ग्रह की सतह जैसी दिखाई देती हैं। यही दृश्य फोटोग्राफरों और यात्रियों के लिए लामायुरू को खास बनाता है।

कभी यहां हुआ करता था विशाल झील का संसार

लामायुरू की पहाड़ियों का रहस्य सिर्फ रंगों तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिक अध्ययनों में इस क्षेत्र में प्राचीन झील के अवसादों के प्रमाण मिले हैं।

शोध के अनुसार लामायुरू क्षेत्र में हजारों साल पहले एक बड़ी झील मौजूद थी। एक अध्ययन में इसके गठन को करीब 35,000 से 40,000 वर्ष पहले की भूगर्भीय गतिविधियों से जोड़ा गया है। इस प्राचीन झील के तल में जमा हुई मिट्टी और अन्य अवसाद बाद में भू-दृश्य का हिस्सा बने।

आज इन्हीं पुरानी परतों का कुछ हिस्सा पहाड़ियों की सतह पर दिखाई देता है।

पहाड़ों के अजीब आकार का राज क्या है?

लामायुरू की पहाड़ियों को ध्यान से देखने पर उनकी सतह सामान्य पर्वतों जैसी नहीं लगती। कहीं गहरी धारियां हैं तो कहीं छोटी-छोटी लहरों जैसी आकृतियां।

इसके पीछे लंबे समय तक चले कटाव, अवसादन और भूगर्भीय गतिविधियों की भूमिका है। वैज्ञानिक शोध में लामायुरू क्षेत्र को इंडस-त्सांगपो स्यूचर जोन से जुड़ा बताया गया है। यहां चट्टानों और अवसादों पर टेक्टोनिक गतिविधियों का प्रभाव भी दर्ज किया गया है।

हजारों वर्षों तक हवा, पानी, बर्फ और तापमान में बदलाव ने इन परतों को काटकर वर्तमान स्वरूप देने में योगदान दिया।

चट्टानों में छिपी है हिमालय बनने की कहानी

लद्दाख की चट्टानें सिर्फ सुंदर दृश्य नहीं बनातीं, बल्कि हिमालय के भूगर्भीय इतिहास की जानकारी भी देती हैं।

लद्दाख भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों की टक्कर से जुड़े बेहद महत्वपूर्ण भूगर्भीय क्षेत्र का हिस्सा है। यहां मिलने वाली विभिन्न चट्टानें और अवसादी परतें इस क्षेत्र के पुराने पर्यावरण और भूगर्भीय बदलावों के बारे में संकेत देती हैं।

यानी जिन पहाड़ियों को पर्यटक सिर्फ खूबसूरत रंगों के कारण देखते हैं, उनके भीतर करोड़ों वर्षों की पृथ्वी की कहानी भी दर्ज है।

कहीं पीली मिट्टी, कहीं बैंगनी-धूसर चट्टानें

लामायुरू और आसपास के क्षेत्रों में अलग-अलग प्रकार की चट्टानी और मिट्टी की परतें देखने को मिलती हैं। कुछ जगह सफेद-पीली मिट्टी जैसी संरचनाएं दिखाई देती हैं, जबकि दूसरी जगह बैंगनी-धूसर चट्टानों के बीच अलग रंगों की परतें नजर आती हैं।

इन रंगों का संबंध चट्टानों के खनिज और उनके निर्माण की परिस्थितियों से है। यही विविधता पहाड़ियों को दूर से बेहद रंगीन बनाती है।

क्या सिर्फ लामायुरू में हैं रंगीन पहाड़ियां?

नहीं। लद्दाख के दूसरे हिस्सों में भी बहुरंगी पर्वतीय दृश्य देखने को मिलते हैं। खासकर चांगथांग क्षेत्र में रंगीन पहाड़ियां, ऊंचे पठार और झीलों का अनोखा संयोजन दिखाई देता है। लद्दाख प्रशासन भी चांगथांग की झीलों के आसपास मौजूद रंगीन पहाड़ियों को क्षेत्र की खास प्राकृतिक विशेषताओं में शामिल करता है।

इसलिए ‘रंगीन पहाड़ियां’ किसी एक पहाड़ी तक सीमित घटना नहीं हैं। लद्दाख का भूगर्भीय स्वरूप ही कई जगह इस तरह के दृश्य पैदा करता है।

मौसम भी बदल देता है पहाड़ों का रंग

लद्दाख का मौसम बेहद शुष्क है और यहां हवा में नमी अपेक्षाकृत कम रहती है। ऐसे वातावरण में दूर की चट्टानें भी साफ दिखाई देती हैं।

जब सूरज की रोशनी पहाड़ियों पर पड़ती है तो चट्टानों की अलग-अलग परतें अलग रंगों में उभरने लगती हैं। बादल आने पर वही पहाड़ गहरे और रहस्यमयी दिख सकते हैं। सूर्यास्त के समय लाल और सुनहरे रंग ज्यादा उभरते हैं।

यही कारण है कि एक ही जगह की तस्वीर अलग-अलग समय पर बिल्कुल अलग दिखाई दे सकती है।

‘मूनलैंड’ सिर्फ नाम नहीं, भूगर्भीय कहानी है

लामायुरू को ‘मूनलैंड’ कहना केवल पर्यटन को आकर्षित करने वाली उपमा नहीं है। यहां की वास्तविक भू-आकृतियां इस नाम को काफी हद तक सार्थक बनाती हैं।

लद्दाख प्रशासन के अनुसार लामायुरू का लूनर लैंडस्केप यहां आने वाले पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण है।

हालांकि इसे चंद्रमा की वास्तविक सतह जैसा मानना सही नहीं होगा। यह पृथ्वी पर बनी ऐसी भू-आकृति है जो अपनी सूखी, उजाड़ और कटाव वाली सतह के कारण चंद्रमा जैसे दृश्य का एहसास कराती है।

प्राचीन झील से आज की पहाड़ियों तक

लामायुरू की कहानी को अगर सरल भाषा में समझें तो कभी इस इलाके में पानी और झील का प्रभाव था। समय के साथ भूगर्भीय हलचल, जलवायु परिवर्तन और कटाव ने इस भू-दृश्य को बदल दिया।

वैज्ञानिक अध्ययनों में यहां प्राचीन झील के अवसादों में मिट्टी, बालू, कंकड़ और जैविक अवशेषों की अलग-अलग परतों की पहचान की गई है।

आज वही पुरानी भूगर्भीय कहानी पहाड़ियों की परतों और आकृतियों में दिखाई देती है।

पर्यटकों के लिए क्यों खास है यह इलाका?

लामायुरू में प्राकृतिक भू-दृश्य के साथ ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व भी जुड़ा है। यहां प्रसिद्ध लामायुरू मठ स्थित है। लद्दाख प्रशासन के अनुसार मठ की स्थापना 11वीं शताब्दी में महा सिद्धाचार्य नारोपा से जुड़ी परंपरा से मानी जाती है। यहां वार्षिक युरू कबग्यात उत्सव भी आयोजित होता है।

इस तरह एक ही जगह पर पहाड़, प्राचीन भूगर्भीय इतिहास, बौद्ध संस्कृति और रहस्यमयी दिखने वाला प्राकृतिक दृश्य देखने को मिलता है।

रंग बदलती पहाड़ियों का असली रहस्य

लद्दाख की ‘रंग बदलती पहाड़ियों’ का रहस्य किसी चमत्कार से ज्यादा भूगर्भ और प्रकृति के लंबे खेल में छिपा है।

अलग-अलग चट्टानें और खनिज अलग रंग देते हैं। पुरानी झीलों के अवसाद पहाड़ियों की परतों में अपनी कहानी छोड़ गए हैं। हवा और पानी ने हजारों वर्षों तक इन चट्टानों को काटा। फिर सूर्य की रोशनी ने इन रंगों को और उभार दिया।

यही सभी प्रक्रियाएं मिलकर लद्दाख को ऐसा दृश्य देती हैं, जिसे देखकर पहली नजर में लगता है कि पहाड़ सचमुच अपना रंग बदल रहे हैं।

निष्कर्ष

लद्दाख की रंगीन पहाड़ियां हमें यह बताती हैं कि प्रकृति का रहस्य हमेशा रहस्यमय शक्तियों में नहीं होता। कई बार करोड़ों साल पुरानी भूगर्भीय प्रक्रियाएं ही सबसे अद्भुत कहानी लिखती हैं।

लामायुरू इसका शानदार उदाहरण है। यहां की पीली, लाल, भूरी, हरी और बैंगनी छटा सिर्फ आंखों को आकर्षित नहीं करती, बल्कि प्राचीन झीलों, चट्टानों, टेक्टोनिक गतिविधियों और हिमालय के निर्माण की कहानी भी सुनाती है।

यही वजह है कि लद्दाख की ये पहाड़ियां सिर्फ पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि धरती की खुली हुई भूगर्भीय किताब भी हैं।


जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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