मुंबई की मुकेश मिल्स: समुद्र किनारे खंडहर, 1982 की आग और डरावने किस्सों का रहस्य
समुद्र किनारे खड़ा वह खंडहर, जहां दिन में कैमरे और रात में डरावने किस्से
जहां दिन में कैमरे चलते थे, वहां रात में सुनाई देती हैं रहस्यमयी आवाजें
मुंबई की चकाचौंध, समुद्र किनारे की ऊंची इमारतों और बॉलीवुड की चमक-दमक के बीच एक ऐसी जगह भी है, जिसकी पहचान ग्लैमर से ज्यादा रहस्य और डर से बनी है। दक्षिण मुंबई के कोलाबा इलाके में समुद्र के किनारे स्थित मुकेश मिल्स आज जर्जर दीवारों, टूटे दरवाजों, जंग लगी लोहे की संरचनाओं और वीरान गलियारों के बीच खड़ी है।
कभी कपड़ा उद्योग की हलचल से गुलजार रहने वाली यह मिल अब मुंबई की चर्चित परित्यक्त जगहों में गिनी जाती है। 1982 की भीषण आग के बाद इसका औद्योगिक जीवन लगभग समाप्त हो गया और बाद में यही खंडहर बॉलीवुड के लिए एक अनोखा शूटिंग लोकेशन बन गया।
लेकिन मुकेश मिल्स की कहानी सिर्फ आग, खंडहर और फिल्मों तक सीमित नहीं है। वर्षों से इसके साथ कई भूतिया और अलौकिक किस्से भी जुड़ते चले गए। शूटिंग के दौरान कलाकारों और क्रू सदस्यों के कथित डरावने अनुभवों ने इसकी छवि को और रहस्यमयी बना दिया।
19वीं सदी में शुरू हुआ था सफर
मुकेश मिल्स के इतिहास को लेकर अलग-अलग स्रोतों में स्थापना वर्ष और संस्थापक के संबंध में कुछ अंतर मिलता है। कई स्रोत इसे 1870 के दशक की मिल बताते हैं और इसका संबंध मूलजीभाई माधवानी से जोड़ते हैं। समुद्र के बेहद करीब होने के कारण मिल के पास अपना निजी डॉक भी था, जहां कपास और तैयार माल की आवाजाही होती थी।
उस दौर में मुंबई तेजी से कपड़ा उद्योग का बड़ा केंद्र बन रहा था। दक्षिण मुंबई में स्थित यह मिल समुद्री परिवहन की सुविधा के कारण व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती थी। मशीनों की आवाज, मजदूरों की चहल-पहल और कपड़े के उत्पादन से भरा यह परिसर आज की वीरानी से बिल्कुल अलग हुआ करता था।
1982 की आग ने बदल दी पूरी तस्वीर

मुकेश मिल्स के इतिहास में सबसे निर्णायक घटना वर्ष 1982 की भीषण आग मानी जाती है। आग ने मिल परिसर को भारी नुकसान पहुंचाया और कई मजदूरों की मौत की खबरें सामने आईं। इसके बाद मिल का संचालन बंद हो गया और धीरे-धीरे पूरा परिसर वीरान होता चला गया।
यही हादसा आगे चलकर मिल से जुड़ी डरावनी कहानियों का सबसे बड़ा आधार बना। लोगों के बीच यह धारणा बनने लगी कि आग में मारे गए मजदूरों की आत्माएं इस परिसर में भटकती हैं।
हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए मुकेश मिल्स के भूतिया होने की बात को लोकविश्वास और शहरी किंवदंती के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
खंडहर बना बॉलीवुड का पसंदीदा शूटिंग लोकेशन

मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री ने इस वीरान परिसर में एक अलग तरह की खूबसूरती देखी। टूटी दीवारें, पुराने मेहराब, जंग लगी मशीनें, ऊंची चिमनी और समुद्र का बैकग्राउंड फिल्मों के लिए बेहद आकर्षक साबित हुआ।
मुकेश मिल्स में कई चर्चित फिल्मों और गानों की शूटिंग हुई। इनमें अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘हम’ का ‘जुम्मा चुम्मा’ भी शामिल है। इसके अलावा सड़क, हेरोपंती, ओम शांति ओम और बाद की कई फिल्मों के दृश्यों में इस परिसर की झलक दिखाई दी।
इस तरह एक तरफ मिल डरावनी जगह के रूप में मशहूर होती गई, तो दूसरी तरफ फिल्मकारों के लिए यह एक प्राकृतिक हॉरर और एक्शन सेट बन गई।
शूटिंग के दौरान अभिनेत्री की बदली आवाज का किस्सा
मुकेश मिल्स से जुड़ी सबसे चर्चित कहानियों में एक ऐसी अभिनेत्री का किस्सा है, जिसके बारे में कहा जाता है कि शूटिंग के दौरान अचानक उसकी आवाज भारी और पुरुष जैसी हो गई।
कहानी के मुताबिक, अभिनेत्री ने क्रू के लोगों को वहां से चले जाने की चेतावनी दी। घटना से घबराए फिल्मकारों ने कथित तौर पर शूटिंग रोक दी और पूरी टीम वहां से निकल गई।
यह कहानी कई वर्षों से अलग-अलग रूपों में दोहराई जाती रही है। हालांकि, इसके पीछे किसी अलौकिक शक्ति की मौजूदगी का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
बिपाशा बसु से जुड़ा किस्सा भी खूब चर्चित
मुकेश मिल्स से जुड़े किस्सों में अभिनेत्री बिपाशा बसु का नाम भी लिया जाता है। ऑनलाइन और मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि फिल्म फुटपाथ की शूटिंग के दौरान उन्हें एक कमरे से गुजरने और संवाद बोलने में अजीब परेशानी महसूस हुई।
इसके बाद कथित तौर पर पूजा कराई गई और संबंधित दृश्य को किसी दूसरी जगह शूट करने की बात कही गई। यह भी मुकेश मिल्स की उन कहानियों में शामिल है जिनकी स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है।
रात में कदमों की आहट और परछाइयों के दावे
मुकेश मिल्स में काम करने वाले कुछ सुरक्षा गार्डों और शूटिंग से जुड़े लोगों के बारे में भी ऐसे किस्से सुनने को मिलते हैं कि रात में उन्हें खाली परिसर में कदमों की आवाजें सुनाई देती थीं।
किसी ने अंधेरे गलियारे में परछाईं देखने का दावा किया तो किसी ने अचानक ठंड महसूस होने की बात कही। कुछ कथाओं में यह भी कहा गया कि सुरक्षा कर्मियों ने डर के कारण नौकरी तक छोड़ दी।
लेकिन पुराने औद्योगिक परिसर में हवा, समुद्र की नमी, ढीली लोहे की चादरें, टूटे ढांचे और प्रतिध्वनि जैसी प्राकृतिक वजहें भी ऐसी आवाजों और अनुभूतियों को जन्म दे सकती हैं।
कैमरे बंद होने से लेकर सामान गायब होने तक
फिल्म क्रू से जुड़े किस्सों में तकनीकी गड़बड़ियों का भी जिक्र मिलता है। कैमरा अचानक बंद होना, लाइट का खराब होना या शूटिंग का सामान अपनी जगह पर न मिलना जैसी घटनाओं को भी कभी-कभी रहस्य से जोड़ दिया जाता है।
ऐसी घटनाएं किसी पुराने और असुरक्षित औद्योगिक परिसर में तकनीकी कारणों से भी हो सकती हैं। इसलिए इन्हें paranormal घटना मानने से पहले सामान्य कारणों की संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बच्चे के रोने की आवाज का रहस्य
मुकेश मिल्स की सबसे डरावनी लोककथाओं में एक बच्चे के रोने की आवाज का किस्सा भी शामिल है।
कहा जाता है कि मिल के किसी सुनसान हिस्से से कभी-कभी बच्चे के रोने या चीखने जैसी आवाज सुनाई देती है। रात, वीरान इमारत और समुद्र की आवाजों के बीच ऐसी ध्वनि निश्चित रूप से किसी को भी डरा सकती है।
लेकिन इस दावे की भी कोई प्रमाणित रिकॉर्डिंग या वैज्ञानिक पुष्टि सामने नहीं आई है।
2014 में हुई पैरानॉर्मल जांच
मुकेश मिल्स का रहस्य इतना चर्चित हुआ कि 2014 में पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर गौरव तिवारी और उनकी टीम ने यहां जांच की थी। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, जांच के दौरान कोई स्पष्ट भूत या आत्मा कैमरे में कैद नहीं हुई, हालांकि जांचकर्ताओं ने वहां कुछ असामान्य अनुभव होने की बात कही थी।
यही घटना मुकेश मिल्स की कहानी को और रहस्यमयी बनाती है—क्योंकि सवाल आज भी वही है कि वहां वास्तव में कुछ असामान्य था या फिर पुराने खंडहर का माहौल ही लोगों के मन पर डर का प्रभाव पैदा करता था?
अब क्यों नहीं जा सकते लोग?
मुकेश मिल्स की कहानी का एक महत्वपूर्ण पहलू भूत नहीं, बल्कि इमारत की सुरक्षा है।
2019 में बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) ने परिसर की कई संरचनाओं को जर्जर और शूटिंग के लिए असुरक्षित बताते हुए गतिविधियों पर रोक लगाई थी। बाद में संरचनात्मक ऑडिट की प्रक्रिया भी हुई।
इसलिए यहां लोगों के प्रवेश या शूटिंग पर पाबंदी का कारण केवल भूतिया कहानियां नहीं, बल्कि जर्जर ढांचा और सुरक्षा संबंधी चिंता भी रही है।
डर की कहानी या इतिहास की विरासत?

मुकेश मिल्स को सिर्फ ‘भूतिया जगह’ कहना शायद इसके इतिहास को छोटा कर देना होगा।
यह मुंबई के औद्योगिक अतीत की एक बची हुई निशानी भी है। कभी जहां मजदूर काम करते थे, मशीनें चलती थीं और समुद्र के रास्ते माल आता-जाता था, वहीं आज टूटे मेहराब और जंग लगी संरचनाएं उस दौर की कहानी कहती हैं।
1982 की आग ने इस जगह के इतिहास पर एक गहरी छाप छोड़ी। उसके बाद शुरू हुई वीरानी और फिल्मों में इसका इस्तेमाल—इन दोनों ने मिलकर इसे एक ऐसी जगह बना दिया जहां इतिहास, सिनेमा और लोककथा तीनों एक साथ दिखाई देते हैं।
मुकेश मिल्स का सबसे बड़ा रहस्य क्या है?
शायद इसका सबसे बड़ा रहस्य यह नहीं कि वहां भूत हैं या नहीं।
असल रहस्य यह है कि एक औद्योगिक परिसर कैसे पहले मुंबई के आर्थिक इतिहास का हिस्सा बना, फिर आग की त्रासदी से उजड़ा, उसके बाद बॉलीवुड के सबसे चर्चित शूटिंग लोकेशन में बदला और अंततः भारत की सबसे चर्चित ‘हॉन्टेड लोकेशन’ की कहानियों में शामिल हो गया।
भूतों की मौजूदगी का प्रमाण आज भी नहीं है, लेकिन मुकेश मिल्स की वीरान दीवारें और उसका इतिहास अपने आप में एक डरावनी कहानी जरूर सुनाते हैं।
जरूरी बात
मुकेश मिल्स से जुड़े अधिकांश अलौकिक किस्से मीडिया रिपोर्टों, फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के कथित अनुभवों और स्थानीय लोककथाओं पर आधारित हैं। इनके वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। वहीं जर्जर संरचनाओं के कारण बिना अनुमति परिसर में प्रवेश करना जोखिम भरा हो सकता है।



