कंक्रीट के जंगलों में ‘हरे फेफड़े’: जानिए भारत के पहले ‘लिक्विड ट्री’ की पूरी कहानी
न जमीन की जरूरत, न पेड़ के बड़ा होने का इंतजार… पानी में तैरते सूक्ष्म शैवाल से हवा साफ करने की तकनीक ने खींचा ध्यान
भोपाल। शहरों का विस्तार जितनी तेजी से हो रहा है, उतनी ही तेजी से हरियाली के लिए जगह सिकुड़ती जा रही है। सड़कें चौड़ी हो रही हैं, इमारतें ऊंची हो रही हैं और ट्रैफिक बढ़ रहा है। इसके साथ हवा में कार्बन डाइऑक्साइड, धूल और सूक्ष्म प्रदूषक कणों की मात्रा भी चिंता बढ़ा रही है।
ऐसे समय में एक सवाल लगातार सामने आता है—क्या बिना ज्यादा जमीन घेरे शहरों में पेड़ों जैसी भूमिका निभाने वाली तकनीक विकसित की जा सकती है?
इसी सवाल का एक तकनीकी जवाब है ‘लिक्विड ट्री’ (Liquid Tree)। नाम भले ही पेड़ जैसा हो, लेकिन यह पारंपरिक पेड़ नहीं है। यह एक तरह का फोटो-बायोरिएक्टर (Photo-Bioreactor) है, जिसमें पानी के भीतर सूक्ष्म शैवाल यानी माइक्रो-एल्गी (Micro-algae) का इस्तेमाल किया जाता है। यही शैवाल प्रकाश संश्लेषण के जरिए कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं।
कांच के टैंक में छिपा है ‘हरा’ सिस्टम
लिक्विड ट्री को देखकर पहली नजर में यह किसी बड़े पारदर्शी टैंक जैसा दिखाई दे सकता है। टैंक के भीतर हरे रंग का तरल नजर आता है। दरअसल, इसी तरल में सूक्ष्म शैवाल मौजूद होते हैं।
प्रकाश मिलने पर ये शैवाल प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) करते हैं। इस प्रक्रिया में वे वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करते हैं और ताजी ऑक्सीजन छोड़ते हैं। यही वजह है कि इस तकनीक को शहरों में वायु गुणवत्ता सुधारने की सबसे असरदार तकनीकों में गिना जा रहा है।
ध्यान देने योग्य बात: इसे प्राकृतिक पेड़ का सीधा विकल्प मानना सही नहीं होगा। पेड़ केवल ऑक्सीजन ही नहीं देते, बल्कि छाया, जैव विविधता, तापमान नियंत्रण, मिट्टी संरक्षण और वर्षाजल प्रबंधन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए लिक्विड ट्री को शहरी प्रदूषण नियंत्रण की एक अतिरिक्त और सहायक तकनीक के रूप में देखा जा रहा है।
भोपाल से शुरू हुआ भारत का पहला प्रयोग
भारत का पहला ‘लिक्विड ट्री’ मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के स्वामी विवेकानंद पार्क में स्थापित किया गया है। इस क्रांतिकारी तकनीक को ‘मशरूम वर्ल्ड ग्रुप’ द्वारा विकसित किया गया है।
पोर्टेबल / मोबाइल संस्करण (CSIR-CIMFR धनबाद):
भोपाल के स्थायी मॉडल के अलावा, CSIR-CIMFR (धनबाद) के शोधकर्ताओं ने एक और बड़ा कदम उठाते हुए “स्मार्ट एल्गल लिक्विड ट्री” (SALT) का पोर्टेबल यानी मोबाइल संस्करण विकसित किया है। इसे ट्रैफिक जंक्शनों और अत्यधिक प्रदूषित इलाकों में ज़रूरत के हिसाब से आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है।
लिक्विड ट्री काम कैसे करता है?
इसकी पूरी प्रक्रिया को आसान भाषा में समझें तो यह कुछ इस तरह काम करती है:
दूषित हवा-कार्बन डाइऑक्साइड-माइक्रो-शैवाल-प्रकाश संश्लेषण-शुद्ध ऑक्सीजन
- नियंत्रित वातावरण: टैंक में मौजूद माइक्रो-एल्गी को प्रकाश और आवश्यक पोषक तत्व दिए जाते हैं।
- CO₂ का अवशोषण: शैवाल वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड खींचते हैं और ऑक्सीजन बाहर छोड़ते हैं।
- तकनीकी प्रबंधन: इस पूरी प्रक्रिया को सुचारू रखने के लिए फोटो-बायोरिएक्टर में पानी के प्रवाह, प्रकाश और तापमान को पूरी तरह से नियंत्रित किया जाता है।
यानी यहां प्रकृति की स्वाभाविक प्रक्रिया को खत्म नहीं किया गया है, बल्कि आधुनिक तकनीक की मदद से नियंत्रित वातावरण में प्राकृतिक प्रकाश संश्लेषण का उपयोग किया गया है।
क्या यह रात में भी काम करता है?
यही सवाल लिक्विड ट्री को लेकर सबसे ज्यादा दिलचस्पी पैदा करता है।
आमतौर पर पारंपरिक पेड़ रात में प्रकाश संश्लेषण बंद कर देते हैं, लेकिन भोपाल में लगा लिक्विड ट्री रात में भी 24 घंटे काम करता रहता है। इसमें सोलर बैटरी बैकअप की मदद से विशेष LED लाइट्स लगाई गई हैं। यह कृत्रिम प्रकाश रात में भी शैवाल को सक्रिय रखता है, जिससे ऑक्सीजन का उत्पादन रुकता नहीं है।
एक छोटे सिस्टम में बड़ी संभावना
लिक्विड ट्री की सबसे बड़ी खासियत इसका कम जगह में काम करने की क्षमता है। एक पारंपरिक पेड़ को बढ़ने के लिए मिट्टी, जड़ फैलाने की जगह और वर्षों का समय चाहिए। इसके विपरीत, इस फोटो-बायोरिएक्टर को अत्यंत सीमित क्षेत्र में तुरंत स्थापित किया जा सकता है। यही वजह है कि यह तकनीक उन मेट्रो शहरों के लिए वरदान मानी जा रही है जहां जमीन बेहद महंगी है और पारंपरिक हरित क्षेत्र (Green Belt) बढ़ाना चुनौतीपूर्ण है।



